शाहजहांपुर। हिंदी को अब किसी बैसाखी की जरूरत नहीं है। साहित्यकारों का कहना है कि हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी अब समृद्धि ओर अग्रसर है, इसका कारण यह है कि अब साहित्य की पगडंडी पर चलते हुए हिंदी बाजारवाद की ओर लौट चुकी है। बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक हिंदी का परचम लहरा रहा है। फिर चाहें वर्तमान में देेशभर के उत्पादों का विज्ञापन ही क्यों न हों, सभी जगह हिंदी ही हिंदी छाई हुई है। साहित्यिक जगत तो हिंदी का झंडा लेकर देश-दुनिया में घूम ही रहे हैं। यहां तक कि अब हिंदी का रूप और स्वरूप भी बदल रहा है। हिंदी का प्रचलन तीव्र गति से बढ़ा है। उदासीनता के बादल छंटे हैं। लोगों की मानसिकता में भी बदलाव आता जा रहा है। इसलिए कहा जा सकता है कि हमारी राष्ट्रभाषा अब गुलामी की जंजीरें तोड़ने में कामयाब होती नजर आ रही है। हिंदी का प्रचलन बढ़ने के साथ ही अब इसके वर्चस्व की लड़ाई लड़नी बाकी है, ताकि आने वाली पीढ़ी भी गर्व कर सके। इसके लिए कंप्यूटर भी अब हिंदी पढ़ने और लिखने लगे हैं। हम देख सकते हैं कि आज बाजार में हिंदी छाई हुई है, दिनभर टीवी चैनलों पर हिंदी विज्ञापनों की भरमार दिखाई देती है। जो फिल्में अंग्रेजी में देखी भी जा रही हैं, उनका हिंदी में अनुवाद भी साथ-साथ चलाया जा रहा है। इससे जाहिर होता है कि हिंदी को अब किसी बैसाखी की जरूरत नहीं है।
हमारी देवनागरी में साइलेंट कुछ भी नहीं
जब हमारी हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया था, तब संविधान में लिखा गया था कि 15 साल तक अंग्रेजी में कामकाज चलता रहेगा और बाद में इसके प्रतिष्ठित होने पर हिंदी में ही कामकाज किए जाएंगे, लेकिन कुछ अनीतिक कारणों से लोगों की मानसिकता नहीं बदल सकी और इसका खामियाजा राष्ट्रभाषा को भुगतना पड़ा। अपनी भाषा के मामले हम गुलामी की जंजीरें नहीं तोड़ सके। हालांकि साहित्यिक लोग लगातार प्रयत्नशील रहे हैं और अब भी हैं, जिसके कारण हिंदी समृद्ध हुई है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी देवनागरी में साइलेंट कुछ भी नहीं है, जैसी हिंदी लिखी जाती है, वैसी ही बोली जाती है। हिंदी के प्रचलन के साथ इसका वर्चस्व भी बढ़ाने की जरूरत है।
बृजेश मिश्र, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कवि, शाहजहांपुर
बाजार में बज रहा हिंदी का डंका
हिंदी की स्थिति दिनों दिन बेहतर होती जा रही है। अब हिंदी को किसी की उंगली पकड़कर चलने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। इसके कई कारण भी हैं। एक ओर जहां हमारे देश के सुधी साहित्यकारों ने हिंदी को निरंतरता प्रदान की है, वहीं अब बाजार से भी इसका जुड़ाव बढ़ने लगा है। चूंकि वर्तमान में हमारा रहन-सहन, खानपान, हमारी संस्कृति सब कुछ बाजार ही तय कर रहे हैं, इसलिए हिंदी को लोगों ने सफलता का माध्यम बनाना शुरू कर दिया है, इसीलिए बाजार में हिंदी का डंका बज रहा है। विदेशों में भी हिंदी का प्रभाव बढ़ा है, जिस कारण इसका स्वरूप भी बदला है, लेकिन बदलते स्वरूप में इस बात पर भी नजर रखने की जरूरत है कि हमारी राष्ट्रभाषा विकृत न होने पाए।
डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री, साहित्यकार