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‘फिक्र न करिए, आपके वोटरों को नहीं भगाएंगे मेरे समर्थक’

Sat, 07 Jan 2017 11:32 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला शाहजहांपुर
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वर्ष 1980 में पहला चुनाव लड़ने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता राजाराम मिश्र कहते हैं कि अब राजनीति समाजसेवा का जरिया नहीं रही बल्कि धनबल और बाहुबल जुटाने का माध्यम बन चुकी है। पहले ऐसा नहीं था। चुनाव में उतरने वाले लोग बिना किसी तामझाम के प्रचार करते थे। उनके पास न गाड़ियां होती थीं, न कोई एक-दूसरे पर कोई कीचड़ उछालता था। विरोधियों का नाम भी इज्जत से लिया जाता था। आपस में मतभेद ही होते थे, मनमुटाव नहीं। राजनीति में खासी दखलंदाजी रखने वाले राजाराम मिश्र बीते दिनों की याद करते हुए बोले कि उन्होंने पहला चुनाव 1980 में नवाब सादिक अली के खिलाफ लड़ा था। मतदान के दिन उन्हें शिकायत मिली कि नवाब सादिक अली के समर्थक मतदाताओं को भगा रहे हैं और वोट नहीं डालने दे रहे हैं। जब वह यह शिकायत लेकर नवाब साहब के पास गए तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से न सिर्फ उनकी बात सुनी, बल्कि आश्वासन दिया कि ऐसा कुछ भी नहीं है और होगा भी नहीं। उनके पुत्र नवाब सिकंदर अली खां उनसे हाथ नहीं मिलातेेेे थे, बल्कि बड़े होने के नाते आशीर्वाद लेते थे। आज के दौर में ऐसा कहीं दिखाई नहीं देता। श्री मिश्र बताते हैं कि पहले के जमाने में प्रत्याशियों के पास गाड़ियां नहीं होती थीं। साइकिलों या फिर समर्थकों के साथ पैदल ही प्रत्याशी वोट मांगने निकलते थे। उस वक्त कुंवर जितेंद्र प्रसाद, प्रेम किशन खन्ना और विशन चंद्र सेठ के पास ही गाड़ी थी। वर्ष 1967 के चुनाव में प्रत्याशी रहे हरदयाल के पास साइकिल तक नहीं थी। इसी चुनाव में दल सिंह यादव ने चुनाव प्रचार के लिए साइकिल खरीदी थी। इससे पहले उनके पास भी साइकिल नहीं थी। इसी तरह वर्ष 1969 में रफ्फन खां, उमा शंकर शुक्ल जैसे दिग्गजों के पास भी साइकिल तक नहीं थी, इसी तरह सुरेंद्र विक्रम सिंह भी बिना गाड़ी के ही चुनाव लड़े। पहले आपस में किसी की कोई कटुता नहीं होती थी। यह कुरीति धन का प्रवाह बढ़ने से सामने आने लगी। चुनाव लड़ने की लालसा और पार्टी से मिलने वाले धन ने अनैतिकता को जन्म दिया है।
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