काकोरी कांड के महानायकों को समर्पित जनपद के पहले अखिल भारतीय रंग महोत्सव के प्रथम दिन दो नाट्य प्रस्तुतियां हुईं। नामी-गिरामी टीमों की प्रस्तुतियां देखने के लिए कड़ाके की सर्दी में भी दर्शक देर रात तक गांधी भवन में जुटे रहे। खास बात यह रही कि नागपुर (महाराष्ट्र) और उड़ीसा के कलाकार अंत तक दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहे।
पहली प्रस्तुति के रूप में दर्शकों को कला सागर नागपुर के नाटक ‘जिद’ देखने का अवसर मिला। विनोद गारजलवर द्वारा लिखित नाटक एक ऐसे किसान परिवार की दास्तां है, जो गरीबी में पल रहा है। ऐसे में किसान सखाराम की बिटिया गणेशी बीमार पड़ जाती है। उसकी मां रजिया डॉक्टरों के बजाय तांत्रिकों पर विश्वास करती है और बेटी का इलाज ऐसे ही एक तांत्रिक से कराती है, लेकिन तांत्रिक का इलाज बेटी को बचा नहीं पाता है। अंधविश्वास पर आधारित नाटक इसी जिद पर खत्म हो जाता है। इस नाटक का निर्देशन पदम नायर ने किया था।
वहीं, दूसरा नाटक उड़ीसा की टीम ने उड़िया भाषा में ‘धुरकुनी’ खेला। यह नाटक धुरकुनी नामक वाद्य यंत्र बचाने की ओर जाता है। अपनी लोक संस्कृति बचाने के लिए गांव के लोग क्या-क्या करते हैं। यह नाटक माध्यम बखूबी दर्शाया गया। सुरेंद्र मिश्र के नाटक का निर्देशन गदाधर वारिक ने किया था। यानी एक नाटक अंधविश्वास की जिद में बेटी को नहीं बचा सका, लेकिन दूसरा नाटक गांव वालों की जिद के आगे घुटने टेकते हुए अपनी लोक संस्कृति की रक्षा करने में सफल रहा और वही धुरकुनी मंच पर सुनाई पड़ी। इससे पूर्व डॉ. आनंद प्रकाश मिश्र ने दीप प्रज्ज्वलित कर नाटकों का शुभारंभ किया। संचालन डॉ. सुरेश मिश्र का रहा।