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कालचक्र : बुढ़ापे की बेबसी और घुटन का मंचन

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शाहजहांपुर। अकेलेपन में घुटते बुजुर्गों की व्यथा का सोमवार को गांधी भवन प्रेक्षागृह में मंचन किया गया। नाटक में दर्शाया गया कि महानगरीय जीवन में किस तरह माता-पिता अपने बड़े हो चुके बच्चों की उपेक्षा का दंश झेलते हैं। नाटक ‘कालचक्र’ में रंगकर्मियों के उम्दा अभिनय ने दर्शकों की आंखें कई बार नम कर दीं।
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सोमवार शाम गांधी भवन प्रेक्षागृह में जयवंत दलवी द्वारा लिखित कालचक्र नाटक का मंचन किया गया। नाटक की कहानी एक बुजुर्ग दंपति विद्यार्थी विश्वनाथ (कप्तान सिंह कर्णधार), रुक्मिणी (सुप्रिया चटर्जी) के इर्दगिर्द घूमती है। विश्वनाथ और रुक्मिणी का बेटा-बहू अपने जीवन में मस्त हैं। उपेक्षा से दुखी विश्वनाथ एक दिन अखबार में विज्ञापन दे देते हैं कि जिनके माता-पिता न हों, वे उन्हें अपने माता-पिता की तरह गोद ले सकते हैं। इससे उनके बेटे-बहू हतप्रभ रह जाते हैैं। एक प्रोफेसर दंपति विश्वनाथ और रुक्मिणी को माता-पिता के तौर पर स्वीकार कर लेते हैं। दोनों विश्वनाथ और रुक्मिणी को खूब प्यार और सम्मान देते हैं। मरने से पहले विश्वनाथ संदेश देते हैं कि, यह जीवन कालचक्र है, कल तुम हम पर आश्रित थे आज हम तुम पर। कल तुम अपने बच्चों पर आश्रित होगे। हर किसी को उम्र के हर मोड़ पर प्यार और अपनापन चाहिए। नाटक की परिकल्पना और निर्देशन सलोचना कार्की ने की है। सोनम शुक्ला, वरुण कुमार सिंह, प्रीति और फाजिल खां के अभिनय को सराहना मिली। इसके अलावा नाटक में वरिष्ठ रंगकर्मी प्रमोद प्रमिल, रामकुमार, आलोक सक्सेना, मुकेश मानव, सोनू कुमार, कैफ, राज, नौशाद, सुनील बाबू, शिवा शर्मा, अमित पालेकर, पुनीत शर्मा, सचिन, कैलाश गुप्ता, रिजवान सिद्दीकी का सहयोग रहा। संचालन इंदु अजनबी ने किया।
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