अटसलिया की बंद रेलवे क्रासिंग को पार करते समय पति-पत्नी कुंभ एक्सेप्रस ट्रेन की चपेट में आ गए। इससे उनके शरीर के टुकड़े हो गए। शव के टुकड़े काफी दूर तक ट्रेन के चक्कों के साथ घिसटते चले गए। इस हादसे के बाद अप लाइन का यातायात करीब 45 मिनट तक बाधित रहा। सिविल पुलिस, जीआरपी और आरपीएफ के जवानों ने मौके पर पहुंच कर शवों को रेलवे लाइन से हटाया, तब जाकर यातायात बहाल हो सका है।
बुधवार की सुबह करीब साढ़े दस बजे रोजा थाना क्षेत्र के गांव जमलापुर निवासी 45 वर्षीय रामनाथ अपनी विकलांग पत्नी 43 वर्षीय मीनादेवी और दस साल के बेटे विपिन के साथ स्कूटी से जलालाबाद स्थित बहादुरापुर गांव अपनी ससुराल जा रहे थे।
प्रत्यक्षदर्शियो के अनुसार जब रामनाथ की स्कूटी अटसलिया रेलवे फाटक के पास पहुंची तो कुंभ एक्सप्रेस ट्रेन को पास करने के लिए क्रासिंग बंद थी। जल्दबाजी के प्रयास में रामनाथ और उसका बेटा विपिन स्कूटी को बैरियर के नीचे से निकाल कर दूसरे बैरियर के पास आकर रुक गए, लेकिन विकलांग पत्नी मीना धीरे धीरे लगड़ाती हुई आ रही थी।
इसी बीच अपनी पत्नी को जल्दी रेलवे लाइन पार कराने के प्रयास में रामनाथ एक बार फिर उसके पास पहुंचा और अप मेल लाइन को पार करा ही रहा था कि सामने से 12369अप कुंभ एक्सप्रेस ट्रेन आ गई। इसको दोनों लोग नहीं देखकर सके। उसकी हवा में बहते हुए रेल ट्रैक पर आ गई। उस समय ट्रेन की रफ्तार करीब 100 किमी प्रति घंटा रही होगी। इससे कटकर दोनों पति पत्नी के शरीर के चिथड़े उड़ गए। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।
हादसे के प्रत्यक्षदर्शी मृतकों का बेटा विपिन था, जो काफी देर तक कुछ समझ ही नहीं पाया और बहदवास हालत में घटनास्थल से तीन किमी दूर गांव जाकर लोगों को सूचना दी। मौके पर आसपास के तमाम ग्रामीण आ गए और दर्दनाक हादसे के बाद बुरी तरह से क्षत विक्षत हो चुके शवों को देख नहीं सके। बाद में एसएम रोजा ने पोर्टर नवीउल्ला के द्वारा मेमो सिविल पुलिस, जीआरपी और आरपीएफ को दी। इन जवानों ने मौके पर जाकर देखा तब तक पहचान नहीं हो सकी थी।
गांव जमलापुर में हादसे की खबर पाकर मृतक के चचेरे भाई हीरालाल अन्य घरवालों व ग्रामीणो के साथ पहुंच गए। उन्होंने अपने भाई रामनाथ और भाभी मीनादेवी की पहचान की। जब जाकर पुलिस ने शवों को अपने कब्जे में लेकर रेलवे लाइन क्लीयर की। हादसे के बाद अप लाइन का यातायात करीब 45 मिनट तक बाधित रहा है। पुलिस ने दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा है।
आंखो के सामने ही उजड़ गयी दस साल के विपिन की दुनिया
रोजा (ब्यूरो)। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि बेटे की आंखों के सामने उसके पालनहार रेल हादसे के शिकार हो गए। जिनके साथ वह खुशी खुशी घर से कुछ समय पहले ही निकला था और ननिहाल जाने की जिद भी कई दिनों बाद पूरी हुई थी। जिस वक्त हादसा हुआ उस समय उसके पिता रामनाथ स्कूटी और विपिन को रेलवे लाइन से सुरक्षित निकलवाकर किनारे खड़ा कर गए, फिर विकलांग पत्नी मीना को लेने को एक बार फिर रेलवे लाइन पर गए तो लौट कर नहीं आए। तब तक कुंभ एक्सप्रेस ट्रेन उनके जीवन में काल बनकर आई और सब कुछ खत्म करते हुए विपिन के जीवन में ढेर सारा अंधेरा दे गई। मृतक के चचेरे भाई हीरालाल ने बताया कि रामनाथ और उसकी विकलांग पव्नी मीना के अलावा उसके एकमात्र विपिन ही संतान है जो करीब दस साल का है और आठवीं कक्षा का छात्र है। विपिन हादसे के बाद सदमे की स्थिति में है। पेशे से रामनाथ खेती करते हैं, लेकिन दस साल की उम्र में खेती वह कैसे कर पायेगा और उसके आगे का जीवन कैसे कटेगा? यही सवाल लोगों को कचोट रहा था, लेकिन उत्तर किसी के पास नहीं था।
मिलनसार, जीवटता के प्रमाण थे मीना और रामनाथ
रोजा (ब्यूरो)। अटसलिया रेलवे फाटक के हादसे के बाद पहुंचे गांव की कई महिलाओं का रो-रोकर बुरा हाल था। इसी झुंड में एक महिला चीत्कारें मार कर रो रही थी जो जमलापुर की चंद्रवती थी रिश्ते में मृतकों की खानदानी बहु थी। सिसकते हुए चंद्रवती ने बताया कि सुबह से ही चाची काफी खुश थीं। घर पर खाना बनाया और सब ने खाया फिर तैयार हो गई। चलते समय हमने कहा चाची कब आओगी तो दो तीन दिन में वापस आने की बात कही हमें क्या पता था कि चाची हमें हमेशा के लिए छोड़कर जा रही हैं। वैसे भी मृतक रामनाथ और विकलंाग मीना का गांव में अच्छा रसूख है। विकलांग मीना मिलनसार थीं विकलांगता की उसके जीवन में अवरोध नहीं बनी और हर मुसीबत में उसने जीवटता का परिचय था। यही कारण रहा कि हादसे के बाद मौके पर जमलापुर के अलावा आसपास के कई लोग आ गए और आनन फानन में पंचनामा की प्रक्रिया को पूरा कराकर शव को पोस्टमार्टम कराने ले गए थे।
रेलवे का बंद फाटक पार करना तो जैसे जन्मसिद्ध हो
दो साल में तीन दर्जन लोग गवां चुके हैं जान
राजेश बाजपेयी
रोजा। बंद रेलवे क्रासिंग को पार करना शायद हम भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है। यही कारण है जल्दबाजी के चक्कर में लोग अपने जान की परवाह नहीं करते और बंद क्रासिंग को पार करने के प्रयास में हादसे का शिकार होते रहते हैं। अटसलिया फाटक शाहजहांपुर- सीतापुर मार्ग पर रेलवे का अहम फाटक है, जिसे नान इंटरलॉकिंग सिस्टम से जोड़कर पावर केबिन के स्टेशन मास्टर द्वारा संचालित किया जाता है। पश्चिमी केबिन पर सिर्फ गेटमैन रहता है जो स्टेशन मास्टर के इशारे पर गेट को बंद करने और खोलने का काम करता है। बुधवार को हादसा होने के बाद भी इस मार्ग पर चलने वालों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी और घटना के कुछ समय बाद जल्दबाजी की जिंदगी अपने पुराने ढर्रे पर चलती नजर आई। पुलिस और रेलवे के आकड़े बताते हैं कि बीते दो साल में मोहम्मदी फाटक और अटसलिया फाटको पर रेल हादसे से करीब तीन दर्जन लोगो की मौत हुई है, लेकिन लोगों ने कोई सबक नहीं लिया। ऐसा नहीं कि रेलवे की ओर से रेल क्रासिंग के समय बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बार बजर प्रसारित कि या जाता है, लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं देता। जरूरत है अपने को सुधारने के साथ जागरूकता फैलाने की है। इसके लिए शासन प्रशासन के साथ लोगों को अपनी जल्दबाजी के बारे में सोचना होगा।