क्षेत्र की ग्राम पंचायत पृथ्वीपुर ढाई के पूर्व प्रधान 65 वर्षीय द्वारिका सिंह यादव को बुधवार दिन के चार बजे ढाई गांव मे बड़ौदा उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक के सामने भरे बाजार तीन युवकों ने गोलियों से छलनी कर मौत के घाट उतार दिया। हत्यारे मृतक की लाइसेंसी रायफल भी ले गये। हत्या के चार घंटे बाद तक शव घटनास्थल पर पड़ा रहा। पुलिस के देरी से पहुंचने के कारण मृतक के परिवार वालों में रोष है। पुलिस ने परिवार को समझाकर शव अपने कब्जे में ले लिया है। घटना के बाद से इलाके में दहशत है।
ग्राम पंचायत पृथ्वीपुर ढाई के मजरा चक निवासी द्वारिका सिंह यादव का एक मकान ढाई गांव में भी है। सुबह ढाई गांव आए द्वारिका सिंह शाम करीब चार बजे बाइक से घर गांव चक जाने के लिए निकले थे। ढाईगांव में ही बड़ौदा उप्र ग्रामीण बैंक के सामने पहले से घात लगाए बैठे तीन हमलावरों ने पहले तमंचे से उनको दो गोली मारीं। इससे वह बाइक समेत जमीन पर गिर पड़े। इसके बाद हमलावरों ने उनकी ही रायफल उठाकर ताबड़तोड़ फायरिंग करते हुए पूरी मैग्जीन उनके सिर पर खाली कर दी।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हत्यारे आराम से तमंचा और रायफल लहराते हुए बाइक पर सवार होकर फायरिंग करते हुए जलालाबाद रोड की तरफ भाग गए। घटना के समय बैंक ड्यूटी पर दो पुलिसकर्मियों के अलावा तमाम दुकानदार और ग्रामीण मौजूद थे, लेकिन किसी ने भी हमलावरों को रोकने-टोकने की हिम्मत नहीं जुटाई। कुछ लोगों का कहना है कि हत्या में तीन युवक ही शामिल थे लेकिन उनकी निगरानी में कई लोग इधर-उधर दुकानों पर बैठे हुए थे। हत्या के बाद सभी भाग गए।
दिनदहाड़े हुई हत्या केे बाद सैकड़ों लोगों का मजमा लग गया। मृतक के परिवार के लोग भी गांव चक से मौके पर आ गए। पुलिस घटना के करीब दो घंटे बाद मौके पर पहुंची। मृतक के परिवार वाले पुलिस के देर से पहुंचने पर आक्रोशित हो गए। भीड़ ने करीब चार घंटे बाद पुलिस को शव उठाने दिया।
चुनावी रंजिश तो
नहीं हत्या की वजह
गांव पृथ्वीपुर निवासी कश्मीर सिंह यादव की 25 अक्टूबर 2012 को सहकारिता चुनाव के दौरान हो हत्या गई थी। इसमें कश्मीर के भाई आमोद कुमार यादव उर्फ पिक्की बाबू ने द्वारिका सिंह यादव, उनके बेटे सत्येंद्र सिंह और भाई वीरपाल सिंह के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कराया था। इस मामले मे द्वारिका और वीरपाल जमानत पर छूट गए,जबकि सत्येंद्र अभी भी जेल में है। द्वारिका सिंह की हत्या को कश्मीर की हत्या के बदले के रूप में देखा जा रह है।
एक बार खुद, दूसरी
बार पुत्रवधु रही प्रधान
मिर्जापुर। वर्ष 1998 में ग्राम प्रधान सुंदरलाल वर्मा के आकस्मिक निधन के बाद हुए उपचुनाव में द्वारिका सिंह पहली बार प्रधान बने थे। वर्ष 2000 में पंचायत के सामान्य चुनाव में प्रधान पद महिला के लिए आरक्षित हो जाने के बाद द्वारिका सिंह ने अपनी पुत्रवधू मिथलेश को चुनाव लड़वाया था। इसमें वह विजयी रहीं। वर्ष 2005 के चुनाव में द्वारिका, की कश्मीर से कड़ी टक्कर हुई थी, इसमें बिरादरी का वोट बंट जाने के कारण तीसरे प्रत्याशी रामप्रकाश वर्मा जीत गए थे। वर्ष 2010 के चुनाव में सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। इसमें कश्मीर ने अपने गांव के रामनाथ को लड़ाया था, जबकि द्वारिका ने दूसरा प्रत्याशी मैदान में उतारा। चुनाव में कश्मीर समर्थित रामनाथ की जीत हुई थी। पंचायत और सहकरिता चुनाव में द्वारिका और कश्मीर सिंह का मुकबला होता था। इसी चुनावी रंजिश में कश्मीर सिंह की भी हत्या हुई थी।