बड़ा हरेवा कांड में प्रशासन ने जितनी तेजी से पीड़िताओं को आर्थिक मदद देने के लिए हाथ बढ़ाए थे, उस रफ्तार से उसका फायदा उन्हें होता नहीं दिख रहा। जी हां, यहां बात की जा रही है उन 90-90 हजार के चेकों की, जिसके भुगतान के लिए तहसीलदार ने अलग-अलग सेवा केंद्रों पर जन-धन खाते तो खुलवा दिए, लेकिन यह नहीं सोचा कि इन खातों में इतनी बड़ी रकम का भुगतान कैसे होगा? क्या प्रशासन मदद देकर उस वक्त सिर्फ वाहवाही लूटना चाहता था या फिर उसकी नासमझी थी? यहां बता दें कि जन-धन खातों में 10 हजार से ज्यादा धनराशि की जमा निकासी का प्रावधान नहीं है। इसी का परिणाम है कि चेकों के भुगतान के लिए पीड़ित महिलाएं बीते कई दिनों से बैंकों के चक्कर लगा रही हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
बता दें कि अनुसूचित जाति की होने के कारण डीएम की ओर से अनुसूचित जाति तथा जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत हरेवा कांड की पीड़ित सभी पांच महिलाओं को 90-90 हजार की धनराशि के चेक वितरित कराए गए थे। साथ ही उक्त चेकों के भुगतान के लिए बैंकों में खाता खुलवाने के निर्देश तहसीलदार को दिए गए थे, लेकिन काम करने की बजाय पल्ला झाड़ने की नियति के चलते प्रशासन द्वारा तीन महिलाओं के जीरो बैलेंस से खाते स्टेट बैंक के संचालित ग्राहक सेवा केंद्र पिटारमऊ में जन धन योजना के तहत खुलवा दिए गए, जबकि एक महिला का ग्राहक सेवा केंद्र बारह पत्थर तथा दूसरी का सरैंया मोड़ के सेवा केंद्र पर खाता इस योजना के तहत पहले ही ग्राहक सेवा केंद्र पर खुला हुआ था। चूंकि इस योजना के तहत खुले खातों में 10 हजार से ज्यादा धनराशि की जमा निकासी का प्रावधान नहीं है तथा ऐसे खातों में एक बार में 50 हजार से ज्यादा की धनराशि भी जमा नहीं हो सकती। इसके चलते बैंक ने चेक जमा करने तथा पेमेंट दोनों कार्य करने से हाथ खड़े कर दिए। बिना पढ़ी लिखी मजबूर उक्त पीड़िताएं रोजाना इधर-उधर के चक्कर लगा रही हैं।
मामले की जानकारी आज ही हुई है। इस संबंध में स्टेट बैंक के मैनेजर से बात की गई है। पीड़ित महिलाओं को कुछ बैलेंस के साथ नए खाते खुलवाने होंगे। जल्द ही यह कार्य करा लिया जायेगा।
- ओमकार नाथ वर्मा, तहसीलदार
उक्त महिलाओं के खाते जनधन योजना में जीरो बैलेंस से खुलवा दिए गए। इससे इन चेकों का पेमेंट या उनका जमा हो पाना संभव नहीं है। यह कार्य नए खाते खुलने से ही संभव हो सकेगा।
- जफर हुसैन सिद्दीकी, शाखा प्रबंधक एसबीआई