रविवार को कृपाल सिंह के अंतिम संस्कार में काफी संख्या में लोग शामिल हुए। भीड़ को देखते पुलिस भी काफी सतर्क रही। श्मशान घाट पर अंतिम क्रिया पूरी हो जाने सुरक्षाकर्मी डटे रहे।
मोहल्ले में कृपाल का व्यवहार काफी अच्छा था। घरवालों को तो रात में ही उनके मरने की सूचना मिल गई थी, लेकिन मोहल्ले के लोगों को सुबह जैसे ही उनकी मौत की खबर मिली, शुभचिंतकों का तांता लगना शुरू हो गया। बड़ी तादाद में पुलिस अधिकारी दलबल के साथ डटे थे। जैसे ही एंबुलेंस से कृपाल सिंह का शव उनके दरवाजे पर पहुंचा कि घर की महिलाओं में कोहराम मच गया। लगभग आधा घंटा घर पर शव रोकने के बाद उनकी अंतिम यात्रा खन्नौत मोक्षधाम के लिए शुरू कर दी गई। सभी भाइयों के अलावा पीड़ित बिटिया के पिता ने भी अर्थी को कंधा दिया। चूंकि घर से लालपुल मोक्षधाम काफी दूर है, इसलिए अर्थी को अंत्येष्टि स्थल तक पहुंचने में काफी समय लगा। रास्ते को कोई गड़बड़ न हो जाए, इस लिहाज से सभी प्रमुख चौराहों और मोक्षधाम की मोड़ तथा मोक्षधाम पर पुलिस के अधिकारी अपने जवानों के साथ डटे रहे। मुखाग्नि कृपाल सिंह के बड़े भाई वीरपाल सिंह ने दी।
छतों पर भी जुटीं रहीं महिलाएं
कृपाल सिंह का शव जैसे ही उनके गदियाना स्थित आवास पर पहुंचा कि मोहल्लों की महिलाओं समेत बड़ी संख्या में लोग उनके यहां पहुंचने शुरू हो गए। भीड़ की हालत यह थी कि पूरी गली में पुरुष और आसपास की छतों पर महिलाएं अंतिम यात्रा देखने के बाद विचलित हो रही थीं। सभी की आंखें नम थीं।
मोक्षधाम पर भी नहीं रुके बिटिया के पिता के आंसू
कृपाल सिंह पर हमला होने के बाद पीड़ित के पिता ही उन्हें बरेली ले गए और रविवार को उनके शव को एंबुलेंस पर वही लेकर आए थे। श्मशान भूमि पर जब चिता सजाई जा रही थी, तब वह होनी को कोस रहे थे और अपने आंसू पोछ रहे थे। उनके मुंह से एक बार यही निकला %ईश्वर अब कितनी परीक्षा लेगा, अत्याचारी को छोडना मत प्रभु’।
कड़ी मेहनत से बना आशियाना
मेहनती और स्वभाव से अडिग से कृपाल
शाहजहांपुर। कृपाल सिंह ने कई सालों लगातार कड़ी मेहनत करके जो आशियाना बनाया था, उसे छोड़कर एक पल में वह खुद ही बिखर गया। कृपाल बचपन से लेकर जवानी तक अडिग स्वभाव का रहा। उसने जो ठान लिया, उसे पूरा करके ही छोड़ता था। उसने आसाराम के सेवादार बनने के दौरान, जीवन बीमा निगम में काम करने के दौरान करमवीर का साथ देने और आसाराम के खिलाफ गवाही देने के मामले में कृपाल सिंह अडिग रहा। शायद यह अडिगता ही उसकी जान की दुश्मन बन गई।
सिंधौली थाना क्षेत्र के गांव चड़ारी में रहने वाले कृपाल सिंह करीब दस साल पहले शहर के मोहल्ला गदियाना में रहने आए थे। तीन साल तक वह किराए के मकान में रहते थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना मकान बना लिया था। इस बारे में मृतक के बड़े भाई वीरपाल ने कहा कि कृपाल ने बीमा कंपनी में काफी मेहनत से काम किया था। करीब सात साल पहले कृपाल ने चेतराम इंटर कॉलेज के पास प्लॉट खरीदकर मकान बना लिया था। इसके बाद कृपाल की मदनापुर क्षेत्र के गांव ढर्कुरी निवासी शिवपाल सिंह की बेटी नीरज से छह साल पहले शादी हुई थी। नीरज के पिता शिवपाल का भी शहर के मोहल्ला सिंजई में मकान था।
कृपाल की शादी उसी मकान से हुई थी। शादी के एक साल बाद कृपाल के घर बेटे वंश का जन्म हुआ था। बेटे के जन्म के बाद से खर्च बढ़ा तो कृपाल ने अपने काम में और मेहनत करना शुरू कर दिया था। साथ ही अन्य कार्य करने के लिए भी प्रयास शुरू कर दिया था। इसी दौरान वह आसाराम के करीब होता गया और अपने काम में भी कोई कमी नहीं होने दी। इधर आसाराम से मोहभंग होने के बाद करमवीर के संपर्क में भी रहा तो इतना खतरा होने के बावजूद कृपाल हमेशा काम करने में पीछे नहीं हटता था। करमवीर से बातचीत करके वह अपने काम को और बढ़ाना चाहता था। इसी मेहनत के दम पर उसने शहर में खुद का मकान बना लिया था।