शाहजहांपुर। रेलवे के आवासों की स्थिति अच्छी नहीं है। किसी की छत टपक रही है, तो कहीं दीवारों में सीलन है। रेल कर्मचारी जर्जर आवासों में रहने को मजबूर है। इन आवासों की मरम्मत के लिए रेलवे की ओर से बजट भी जारी किया जाता है, लेकिन कोरोना का बहाना बनाकर मरम्मत का कार्य नहीं कराया जा रहा है। इसको लेकर नरमू की ओर से कई बार मांग भी की जा चुकी है।
शहर में ढका ताल, मालगोदाम रोड, गोविंदगंज, टीटीसी, गैंगमैन, स्टेशन रोड पर रेलवे के विभिन्न श्रेणियों के आवास बनें हैं। इनकी संख्या 1000 के करीब हैं और इनका निर्माण ब्रिटिश काल में कराया गया था। तब तैयार हुए सौ साल से भी ज्यादा पुराने तमाम रेल आवास पर्याप्त देखभाल के अभाव में खंडहर बनते जा रहे हैं। इनमें रहने वाले रेल परिवारों को बारिश में आवासों की जर्जर छतें और दीवारें परेशान कर रही हैं। रेल आवासों की मरम्मत के लिए मिलने वाले बजट का इस्तेमाल सही ढंग से न होने के कारण रेल कर्मचारियों पर हर समय किसी हादसे का खतरा मंडराता रहता है। गोविंदगंज और स्टेशन के सामने वाली कॉलोनियों में ज्यादातर अफसरों का बसेरा है, इसलिए उनका नियमित अनुरक्षण होता रहता है, लेकिन मरम्मत मेें लापरवाही से अन्य कॉलोनियों के ज्यादातर आवास जर्जर हो चुके हैं।
कॉलोनी में सफाई का अभाव, नालियां भी टूटीं
ढका तालाब और माल गोदाम रोड पर स्थित रेल आवासों में सीलन की समस्या बनी रहती है। इस वजह से प्लास्टर छूटता रहता है। कॉलोनी में सफाई न होने के कारण बड़ी-बड़ी झाड़ियां खड़ी हो चुकी हैं, नालियां टूटी और सड़कें जर्जर हैं। बारिश होने पर नालों का गंदा पानी घरों में घुस जाता है। कई रेल आवास तो ऐसे हैं जिनमें न तो दरवाजे ठीक हैं, न खिड़कियां, बारिश होने पर घरों में पानी भी टपकता है। यहां रहना उनकी मजबूरी है। कई बार शिकायत के बाद भी रेल प्रशासन कोई ध्यान नहीं देता।
नहीं मिलता पर्याप्त बजट
रेल आवासों की मरम्मत को उत्तर रेलवे ने दरवाजे, ब्रिक वर्क, लोहे के गेट, रंगाई-पुताई आदि एक दर्जन से अधिक अनुरक्षण कार्य तय किए हैं, लेकिन बजट कम स्वीकृत होने से दीवारों की पेंटिंग का काम भी नहीं हो पाता। जो बजट मिलता भी है, वह स्टेशन चमकाने पर ज्यादा खर्च हो रहा है। नियम यह है कि हर दो माह में सभी आवासों की भौतिक दशा का सत्यापन करके उसी के अनुरूप काम होने चाहिए, लेकिन रेल आवासों की मरम्मत होना तो दूर रहा, नल की खराब टोटियां बदलने जैसे मामूली काम भी महीनों टलते रहते हैं।
चिह्नित कराए जा चुके हैं जर्जर आवास
पिछले कुछ महीनों पहले सहायक मंडल अभियंता द्वारा निरीक्षण कर उन रेल आवासों को चिह्नित भी कराया गया था, जोकि जर्जर हो चुके हैं या फिर उनमें अवैध रूप से लोग रह रहे हैं। ऐसे रेल आवासों की संख्या करीब 100 होगी, जोकि रिजेक्ट घोषित किए जा चुके हैं।
रेल कर्मचारियों के वेतन से होती है अनुरक्षण व्यय की कटौती
कर्मचारियों को देने वाली सुविधाओं व रखरखाव के लिए रेलवे उनके वेतन से अनुरक्षण व्यय की कटौती करती है। सर्विस इंप्रूवमेंट ग्रुप (एसआईजी) वेतन से कटने वाली धनराशि का हिसाब रखता है। इसी कोष से स्टेशन वार सालाना बजट जारी किया जाता है। बताया जाता है कि स्वीकृत होने वाली धनराशि में रेलवे का 30 फीसदी अंशदान रहता है। नियम यह है कि अनुरक्षण मद में वेतन से काटी गई धनराशि संबंधित कर्मचारी के आवास पर खर्च होनी चाहिए, लेकिन इसका पालन नहीं होता।
पुताई के लिए मिला 30 लाख रुपया, उसी से हो रही मरम्मत
रेलवे के सीआईओडब्ल्यू विद्याराम जाटव ने बताया कि रेल आवासों की मरम्मत के लिए सालाना 60 से 70 लाख रुपये बजट के रूप में मिलता है। जोकि पुताई के काम के लिए आता है, इसी में से रेल आवासों में टूट-फूट को सही कराया जाता है। कोरोना के वजह से इस बार सिर्फ 30 लाख रुपये ही मिले हैं। इसके अलावा कोई फंड है नहीं, जो मिलना था वह भी रोक दिया गया है। इसलिए पुताई आदि का काम नहीं हो पा रहा है।
रेल आवासों की स्थिति काफी दयनीय है। उनके पास जो आवास है उसकी छत बरसात में टपकती है। दूसरा रेल आवास उपलब्ध कराने के लिए कई बार प्रार्थना पत्र दे चुके हैं, लेकिन अभी तक नहीं मिला है। कई रेल आवास तो इतने जर्जर हो चुके हैं कि कभी गिर सकते हैं। - विनोद कुमार
बेटा रेल कर्मचारी है और पूरे परिवार के साथ रेलवे आवास में ही रहते हैं। इसकी हालत काफी जर्जर हो चुकी है। टीन शेड पर छेद हो चुके हैं और छत टपकती है। इससे बचने के लिए तिरपाल तानकर रहना पड़ रहा है। आसपास के रेल आवास भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। - प्रेमवती
कोविड-19 की वजह से मरम्मत के लिए आने वाला बजट आधा कर दिया गया है। इससे रेल आवासों में टूट-फूट आदि को ठीक कराया जा रहा है। आने वाले दिनों में और बजट मिलने पर काम को कराया जाएगा। - रॉकी तुहर, सहायक मंडल अभियंता, उत्तर रेलवे