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फसलें उजड़ने से बचाने को ग्रामीणों ने खोल ली गोशाला

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गांव सतवां बुजुर्ग के गो सेवा आश्रम में पाले जा रहे सांड़। - फोटो : POWAYAN
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पुवायां (शाहजहांपुर)। फसलों को आवारा पशुओं के उजाड़ने से बचाने के लिए सतवां बुजुर्ग गांव के प्रधान और ग्रामीणों ने मिलकर बेहतरीन योजना बनाई। प्रधान के निर्देशन में ग्रामीणों ने गांव में गो सेवा आश्रम नाम से निजी गोशाला खोली। ग्रामीणों द्वारा छोड़े गए सांड़ इसी गोशाला में रखे जाते हैं। गोशाला का खर्च चलाने के लिए ग्रामीण से प्रति बीघा जमीन के हिसाब से दस रुपये हर महीने जमा करते हैं। इससे किसानों द्वारा छोड़े गए पशु आवारा घूमने के बजाय गोशाला में रहते हैं, जिससे उनकी फसलें उजड़ने से बची रहती हैं। गोशाला के संचालन में कोई दिक्कत भी नहीं होती। गोशाला की देखरेख का जिम्मा प्रधान पर है।
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खेतों में हल चलना बंद हुआ तो पशुओं के पालने का चलन भी खत्म होता जा रहा है। ज्यादातर गाय पालने वाले बछड़ों को सांड़ घोषित करके आवारा छोड़ देते हैं। दूध न देने वाली गायों को भी छुट्टा छोड़ दिया जाता है। आवारा पशु खेतों में खड़ी फसलें उजाड़ते हैं, जिससे किसान परेशान है। आवारा पशुओं को रखने के लिए प्रदेश सरकार ने ब्लॉक स्तर पर गोशालाएं खोलीं। मगर सिस्टम की लापरवाही से सरकारी गोशालाएं बदहाली के कगार पर हैं। कई गोशालाओं में पशु भूख से तड़पकर मर जाते हैं। ग्रामीणों के निजी गोशाला खोलने से उनकी फसलें भी बची रहती हैं और सांड़ भी भूखे नहीं रहते हैं।
सतवां बुजुर्ग गांव की जनसंख्या साढे़ तीन हजार के आसपास हैं। यहां ग्रामीणों द्वारा छोड़े गए पशु इधर-उधर घूमकर फसलों को नुकसान पहुंचाते थे। प्रधान संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विपिन मिश्रा ने गांव में पंचायत करने के बाद ग्रामीणों की सहमति पर गोशाला खोलने की योजना बनाई। डीएम से अनुमति मिलने के बाद गांव में गो सेवा आश्रम नाम से गोशाला खोली गई। इसके बाद गांव में घूमने वाले सभी आवारा पशुओं को पकड़कर गोशाला पहुंचा दिया गया। अब सतवां बुजुर्ग की गोशाला में 31 पशु जिनमें 23 सांड़ हैं। इनमें एक खतरनाक सांड़ भी हैं। प्रति महीने रुपये देने के अलावा कुछ लोग भूसा और चारा भी गोशाला को दान करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गोशाला खुलने के बाद से उन्हें रात को खेतों की रखवाली करने की जरूरत नहीं रही।
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छोड़ने वाले किसान के नाम से जाना जाता सांड़
गो सेवा आश्रम में ज्यादातर सांड़ हैं। हर सांड का अपना अलग नाम है। खास बात यह है कि जो व्यक्ति बछड़ा छोड़ता है गोशाला में सांड़ को उसी के नाम से जाना जाता है। मसलन गो सेवा आश्रम में मौजूद सांड़ों के नाम लालाराम, दुष्यंत, गबड़े, बड़कन्ने, योगी, उली, तुन्नकू, हिजड़ी, महरा, छटकी, मोटू, गोलू, पहाड़ी आदि हैं। नाम रखने के पीछे तर्क यह है कि इससे लोग बदनामी समझकर सांड़ छोड़ने से बचेंगे।
महरा सांड़ पर है पांच सौ रुपये का इनाम
गांव सतवां बुजुर्ग में घूमने वाला महरा सांड़ कई दिनों तक पकड़ में नहीं आया था। इस पर गोशाला अध्यक्ष नरेंद्र सिंह ने उसे पकड़ने के लिए पांच सौ रुपये का ईनाम रखा था। फिर गांव के कुछ लोगों ने घेराबंदी करके शुक्रवार को महरा सांड़ को पकड़कर गोशाला पहुंचा दिया।
नीम के पेड़ से तीन दिन तक बांधा जाता है खतरनाक सांड़
खतरनाक सांड़ को पकड़ने के बाद सबसे पहले गोशाला परिसर में खड़े नीम के पेड़ बांध जाता है, जो तीन दिन तक बांध रहता है। मानना है कि तीन दिन तक नीम के पेड़ में बंधे रहने से खतरनाक सांड़ भी सीधा हो जाता है। इसके बाद सांड़ को गोशाला में छोड़ दिया जाता है।
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