निघोना मकरंदपुर के रामबहादुर और शिवदेई की जिंदगी कैसे कटेगी। इस बुजुर्ग दंपति पर पहले कुदरत ने कहर बरपाया और अब अब प्रशासन ने भी मुंह मोड़ लिया है। तकरीबन 70 बरस के इस दंपति का एकमात्र सहारा उनका पौत्र विश्वपाल सिंह था। उसने भी एक पखवाड़ा पहले फसली नुकसान से आहत होकर आत्महत्या कर ली थी।
सदर तहसील के गांव निघोना मकरंदपुर निवासी रामबहादुर और उनकी पत्नी शिवदेई का शरीर अशक्त और जर्जर हो गया है। तीन पुत्रों में नन्हें सिंह की मौत हो चुकी है। बाकी दो पुत्र अपनी ही जिम्मेदारियों को निभाने के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं। नन्हे के बेटे विश्वपाल सिंह थे, जो अविवाहित थे। बंटवारे के बाद वह अपने बाबा-दादी की दो बीघा जमीन से मेहनत कर उनके बुढ़ापे का सहारा बने थे। इस साल बेमौसम बरसात से उनकी दो बीघा जमीन में मात्र दो क्विंटल गेहूं निकला। इससे आहत विश्वपाल ने 18 मार्च को खेत में ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। सरकार से फसली नुकसान के नाम पर महज 33 सौ रुपये का चेक मिला। भला इतनी रकम से बुजुर्ग दंपति का जीवन कैसे कटेगा। उन्हें कोटेदार भी राशन नहीं दे रहा है। सरकारी योजनाओं के नाम रामबहादुर अथवा उनकी पत्नी शिवदेई को वृद्धावस्था पेंशन तक नहीं मिली। दोनों बतातें है कि प्रधान रघुनाथ से कहा तो बताया कि सरकारी स्कीम बंद हो गई।
आवास के नाम पर रामबहादुर के पास पैतृक रूप से 60 वर्ग मीटर जमीन है। इसमें कच्ची दीवारों पर टीन रखकर गुजारा कर रहा है। गृहस्थी के नाम पर मिट्टी का चूल्हा और चार छह बर्तन, दो टूटी खटिया ही उसके पास जमा पूंजी है। सरकारी योजनाओं से बनने वाले शौचालय का लाभ उस तक नहीं पहुंच सका है। गांव तक सरकारी योजनाओं के दम्भ भरने वाली सरकारों और उनके नौकरशाहों व नुमाइंदो के पास रामबहादुर जैसे लोगों को देखने की फुर्सत नहीं है।