खुटार (शाहजहांपुर)। खुटार के पास कोचर फार्म निवासी बलविंदर सिंह परंपरागत खेती छोड़कर नए प्रयोग कर रहे हैं। अमरूद से शुरू किया उनका प्रयोग सेब की खेती तक आ पहुंचा है। इस वर्ष पौधे छोटे होने के कारण सेब के फल तोड़ दिए गए थे, लेकिन अगले साल जून से सेब का स्वाद लोगों को मिलने लगेगा। खुटार में पैदा होने वाले सेब को लोगों ने खुटारबी सेब का नाम दिया है।
सेब आमतौर पर पहाड़ों और ठंडे स्थानों पर उगने वाला फल है। बलविंदर सिंह बताते हैं कि वह तीन साल से परंपरागत खेती के स्थान पर नए प्रयोग कर रहे हैं। सबसे पहले अमरूद का तीन एकड़ का बाग लगाया और दिसंबर 2021 में सेब के 21 सौ पौधे लगाए हैं। हिमाचल प्रदेश के हरमन शर्मा ने सेब की ऐसी प्रजाति तैयार की है जो पहाड़ के अलावा मैदान में भी अच्छी किस्म के सेब देगी।
जानकारी पाकर उन्होंने हरमन शर्मा से संपर्क किया और हिमाचल से हरमन-99 प्रजाति के सेब के 21 सौ पौधे रोपित कराए। इस वर्ष फरवरी में ही सेब में फूल भी आ गया था, लेकिन पौधे छोटे होने के कारण फूल तुड़वा दिया गया। अब अगले वर्ष फरवरी में फूल आने के बाद जून में कोचर फार्म के खुटारबी सेब का स्वाद लोगों को मिल सकेगा। सेब के साथ शिमला मिर्च आदि की सहफसली खेती भी की जा रही है, जिससे दोहरा लाभ हो रहा है। संवाद
बीएनआर बिही और ताइवान पिंकी की नेपाल तक सप्लाई
बलविंदर सिंह ने तीन वर्ष पहले अमरूद की बीएनआर बिही और ताइबान पिंकी नाम की पौध लगवाई थी। दो एकड़ में बीएनआर बिही और एक एकड़ में ताइवान पिंकी है। आमतौर पर बिही आठ सौ ग्राम से एक किलो तक का होता है, लेकिन बलविंदर सिंह के यहां बिही 1.800 किलो तक का हुआ है। तीन एकड़ में 21 सौ पेड़ हैं और एक पेड़ में सामान्य रूप से 20 से 30 किलो अमरूद हो जाता है। अमरूद का ज्यादा वजन होने के कारण इसको कोकोनट फोम के कवर में कर दिया जाता है, जिससे कीटों से बचाव होता है और टहनी पर भी वजन कम पड़ता है। अमरूद की सप्लाई शाहजहांपुर, पलिया और गोला मंडी में की जाती है। पलिया से अमरूद नेपाल चला जाता है, जहां इसकी काफी डिमांड है।
सात एकड़ में खड़ा है केला
बलविंदर सिंह बताते हैं कि परंपरागत खेती में कम मुनाफे को देखते हुए उन्होंने फलों की खेती शुरू की है। अन्य किसान भी फलों की खेती से ज्यादा लाभ ले सकते हैं। उनके पास जी-09 प्रजाति के केला के पौधे सात एकड़ में खड़े हैं। रेड बेवी किस्म के पपीता के पेड़ भी कई एकड़ में खड़े हैं।
गेंदा रोकता है बीमारी
बलविंदर सिंह के फार्म में कई एकड़ में शिमला मिर्च की फसल है। शिमला मिर्च के चारों ओर गेंदे के पौधे लगे हैं। देखभाल कर रहे रमेश उर्फ कल्लू ने बताया कि शिमला मिर्च में लगने वाले रोग गेंदे में लग जाते हैं और इससे शिमला मिर्च सुरक्षित रहती है। कीटनाशक आदि भी नहीं डालने पड़ते। यह भी नया प्रयोग है।
टपक सिंचाई पद्धति से देते हैं पानी
बलविंदर सिंह पूरी खेती में टपक सिंचाई पद्धति से पानी देते हैं। इससे पानी की काफी बचत होती है और पानी पौधों के ऊपर से गिरने से काफी लाभ भी होता है। उनका कहना है कि जो भी किसान सेब, अमरूद आदि की खेती करना चाहते हैं, वे उनसे जानकारियां ले सकते हैं।