फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

साहित्य भूषण कथाकार की दो कृतियां और हुईं प्रकाशित

Wed, 26 Aug 2015 12:19 AM IST
शाहजहांपुर
विज्ञापन
विज्ञापन
कथाकार हृदयेश को भला कौन नहीं जानता। ये वह नाम है, जिसने जनपद को नई पहचान दी। जिस तरह क्रांतिकारियों की इस नगरी को अमर शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह के नाम से जाना जाता है, साहित्य के क्षेत्र में डॉ. गिरिजानंदन त्रिगुणायत ÒआकुलÓ दादा राजबहादुर ‘विकलÓ, दामोदर स्वरूप Òबिद्रोहीÓ अग्निवेश शुक्ल जैसे विचारकों और चिंतकों ने अपनी रचनाधर्मिता से जनपद को गौरवांवित किया है। वहीं, राजपाल यादव ने बॉलीवुड में अपना सिक्का चलाकर मील का पत्थर स्थापित किया है। उसी तरह हृदय नारायण मेहरोत्रा जिन्हें लोग ÒहृदयेशÓ के नाम से जानते और पहचानते हैं, ने उपन्यास और कहानियों के माध्यम से शाहजहांपुर के पिछड़ेपन के कलंक को दूर किया है। हृदयेश की अब तक तीन दर्जन से अधिक कृतियां नामी-गिरामी प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित की जा चुकी हैं। इस वर्ष उनकी दो कृतियां ‘कथा एक नामी घराने कीÓ और पांच कहानियों के संग्रह ‘हृदयेश के पंचकÓ प्रकाशित हो चुकी हैं।
विज्ञापन

वैसे जरूरत तो नहीं है, लेकिन नई पीढ़ी के लिए उनका परिचय देना जरूरी भी हो जाता है। चौक निवासी हृदय नारायण मेहरोत्रा करीब 85 वर्ष के हैं। मात्र इंटर तक की पढ़ाई जैसे-तैसे पूरी करने के बाद वह कचहरी में टाइप बाबू की नौकरी करने लगे थे। टाइप करते-करते कब उन्हें कहानियां लिखने का शौक लग गया, यह उन्हें भी नहीं मालूम। घर वाले उन्हें प्यार से हृदयेश कहते थे। उन्हें क्या मालूम था कि उनका यही हृदयेश नाम विख्यात हो जाएगा। आज स्थिति यह है कि उन्हें असली नाम से कोई जानता ही नहीं। उनकी कृतियां भी हृदयेश के नाम से प्रकाशित होती हैं। हृदयेश बताते हैं कि उन्होंने 1951 से लेखन कार्य शुरू कर दिया था और कश्मीर भारत का हैÓ नामक पहली कहानी वाराणसी से प्रकाशित हुई थी, जबकि पहला उपन्यास गांठÓ 1970 में प्रकाशित हुआ।
वह बताते हैं कि हृदयेश कथा पंचकÓ में पूर्व प्रकाशित कहानी मनु, अमर कथा, त्रिशंकु, सत्तर पार का वह बूढ़ा और देश की बात कहानी शामिल की गई है, जबकि कथा एक नामी घराने कीÓ पुस्तक में दैवी न्याय, हार-जीत, अविश्वास, सम्मानजनक जीना, आल इज नाट वेल, सलाम हुजूर, पापा जात का जीव, शैलनाथ या बैलनाथ कहानियां शामिल हैं। उन्होंने बताया कि लघु उपन्यास स्वस्थ अस्वस्थ लोगÓ भारती ज्ञानपीठ में प्रकाशन के लिए विचारार्थ है, जबकि कहानी हक बदरÓ फाइनल हो चुकी है। उसकी कंपोजिंग भी हो चुकी है, जिसके शीघ्र प्रकाशित होने की संभावना है।
विज्ञापन

हृदयेश के जीवन पर आधारित एक डाक्यूमेंटरी फिल्म भी बन चुकी है। वह बताते हैं कि उनकी ‘मनुÓ नामक कहानी दिल्ली विश्वविद्यालय में बीए के पाठ्यक्रम में तथा गांठÓ नामक उपन्यास रुहेलखंड विश्वविद्यालय में बीए के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन चुका है। मनुÓ कहानी पर टेलीफिल्म भी बन चुकी है। करीब दर्जनभर शोध कार्य उनके लेखन पर हो चुके हैं। इसमें पीएचडी और एमफिल शामिल हैं। कथाकार हृदयेश को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से वर्ष 2005 का साहित्य भूषणÓ पुरस्कार दिया जा चुका है। यह पुरस्कार उन्हें वर्ष 2006 में मिला था।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें