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रधौली में महिला प्रधान सिर्फ नाम की

Sat, 27 Apr 2013 05:30 AM IST
Shahjahanpur
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अनीता नहीं, पूर्व प्रधान की चौपाल से चल रही है गांव की असली प्रधानी
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- अब भी गांव वालों की निगाह में राजवीर ही हैं असली प्रधान
- मजदूरी छोड़ घर की रखवाली में जुटे प्रधान पति आशाराम
अनूप वाजपेयी
शाहजहांपुर। करीब पांच हजार की आबादी और 1552 वोटरों वाले पिछड़ी जाति बाहुल्य गांव रधौली की ग्राम प्रधान कहने को दलित अनीता देवी हैं, लेकिन ‘परधानी’ ठाकुर बिरादरी के पूर्व प्रधान राजवीर सिंह की चौपाल से संचालित हो रही है। यह बात स्वीकार करने में न तो पूर्व प्रधान को कोई संकोच है और न ही वर्तमान प्रधान को। और तो और, गांव के लोग आज भी अनीता के बजाय राजवीर को ही ‘परधान जी’ कहकर बुलाते हैं।
भावलखेड़ा ब्लाक में खन्नौत नदी के पूर्वोत्तर दिशा में बसे रधौली के बारे में पता चला था कि वहां महिला प्रधान सिर्फ नाम की हैं, असल काम पूर्व प्रधान करा रहे हैं। असलियत जानने को पुवायां रोड पर पैना से आगे रधौली के संपर्क मार्ग पर बाइक दौड़ाई। गांव पहुंचते ही पंचायती राज व्यवस्था में ‘आधी दुनिया’ को हाशिए पर डालने का सच सामने आने लगा। रधौली के मुहाने पर ठीक दोराहे के पास खुली परचून की दुकान पर बैठे युवक से प्रधान के घर का पता पूछने पर उसने एक रास्ते पर इशारा कर दिया।
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थोड़ा आगे बढ़ने पर हैंडपंप से पानी भरी बाल्टी लेकर जाती महिला ने भी आगे की ओर संकेत किया तो लगा कि सही दिशा में जा रहे हैं। तीसरे मोड़ के पास खड़े लोगोें से पूछा तो वे चहककर बोले: वो रहा सामने वाला घर। वहां जाने पर एक कोठीनुमा मकान के बगल में बनी चौपाल में कुछ लोगों को बतियाते देख सुनिश्चित करना चाहा कि हम सही जगह पहुंचे या नहीं। इस पर वहां बैठे एक बुजुर्ग बोले: परधान जी को जहे घर है, अबहीं आउत हैं।
कुछ पल बाद ही कोठी के साइड गेट से लुंगी लपेटे एक सज्जन बाहर निकले। अभिवादन के साथ परिचय हुआ तो मैं अपने साथी छायाकार के साथ ठगा सा खड़ा था। दरअसल, गांव वालों ने हमें गाइड करके जहां पहुंचाया, वह मौजूदा प्रधान के बजाय पूर्व प्रधान राजवीर का घर था और उन्हीं की चौपाल में हम उनके सामने खड़े थे। गर्वोक्ति में विनम्रता घोलकर राजवीर बोले: अबकी दलित महिला अनीता को प्रधानी जिताई है...लंबे समय से हमीं जीतते आ रहे थे, लेकिन बाद में सीट रिजर्व हो गई।
वह आगे बोले: 1995 से 2000 तक खुद प्रधान रहा। इससे पहले मेरी मां सहोदरा देवी प्रधान रहीं। वर्ष 2000 में सीट बैकवर्ड महिला के लिए आरक्षित हुई तो पहले जाहिदा बेगम और फिर रामकिशुन को प्रधान बनाया। बाद में दलित महिला के लिए आरक्षित होने पर आशाराम की घरवाली अनीता को प्रधानी जिताई। तब से अब तक तमाम विकास कार्य कराए। रहे बचे काम वर्ष 2008-09 में अंबेडकर ग्राम घोषित होने पर हो गए।
पूर्व प्रधान के अनुसार, ‘गांव में सभी रोड सीसी हो चुके हैं। प्राइमरी और जूनियर स्कूल समेत स्वास्थ्य उपकेंद्र है। बिजली के 60 पोल लगे हैं, करीब 100 महामाया आवास हैं और 300 शौचालय बन चुके हैं। 289 अतिरिक्त शौचालय स्वीकृत हैं, लेकिन बजट सिर्फ 24 का मिला है। गांव के लोग जो भी बताते हैं, उन कामों पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है।’ मेरे मुंह से बरबस निकला-फिर मौजूदा प्रधान क्या करती हैं?
पूर्व प्रधान बोले: बेचारी बड़ी सीधी-सरल गरीब महिला है, गांव के विकास में उसे पूरी मदद करते हैं। असली प्रधान के घर का पता पूछने पर राजवीर ने आग्रह किया, जो पूछना हो मुझसे पूछ लें। फोटो चाहिए तो मिल जाएगा। घर से अनीता का पासपोर्ट फोटो भी मंगा दिया, लेकिन असली प्रधान से मिलने की हमारी इच्छा भांपकर बेटे आकाश को बतौर गाइड हमारे साथ कर दिया।
गलीनुमा घुमावदार रास्तों कीचड़ के ढेरों से बचते हम लोग एक घर के सामने रुके। आकाश ने आवाज दी तो ओसारे में खाट पर पसरे कृशकाय आशाराम बाहर निकले। प्रधान जी को पूछा तो चार घर के फासले पर खड़ी बेटी अरुणा को हांक लगाकर बोले: अपनी अम्मा को घर पर भेज। कुछ देर बाद मंथर चाल से अनीता आईं और हमें देख अंदर जाने लगीं। फोटो के लिए रुकने का आग्रह करने पर आशाराम बोले: कंडा थोपन से हाथ गंदे हुई गए हैं, धोउन गई हैं।
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बाहर निकली तो प्रधान जी से मुखातिब हुआ। परिवार और गांव का काम एक साथ कैसे करती हैं? प्रधान जी कान तक मुस्काकर चुप्पी साध गईं। तीन बच्चों समेत घर का खर्चा कैसे चलता है? पत्नी की खामोशी को तोड़ते हुए प्रधान पति बोले: तीन बिगहा जमीन है। इत्ती जमीन में काम चल जाता है...और भी कुछ करते हैं? आशाराम बोले: मजूरी पहिले करत थे, अब नाय। गांव वालेन के खेत बटाई पर लइके काम चलाइ लेत हैं। आगे क्या इरादा है? जौन सी जोजना मिलिही, बाके काम कराए जइहीं।
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