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साल गुजरा पर नोटबंदी का दर्द नहीं भूल पा रहे लोग

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शाहजहांपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक साल पहले 8 नवंबर को 500 और एक हजार के नोट बंदी के ऐलान को लोग अब भी भूल नहीं पा रहे हैं। आम आदमी की ये कसक न पूरी तरह से इस कदम के साथ है न पूरी तरह से खिलाफ। दरअसल नोटबंदी का सीधा कोई फायदा लोगों के सामने अभी नहीं आया है, इसलिए इसका दर्द ही ज्यादा है। छोटे कारोबारी, स्वरोजगार करने वाले और दिन भर मेहनत कर कमाने वालों के लिए नोटबंदी का कोई लाभ सामने नहीं आया। इन लोगों का कहना है कि अब वह अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए बैंकों के ऊपर नहीं अपनी बचत पर भरोसा करना पसंद कर रहे हैं। यही वजह है कि बैंकों से खाताधारकों का होने वाला लेनदेन कम हो गया है जबकि लीड़ बैंक का दावा है कि भुगतान कैशलैश होने के कारण लोगों को राहत मिली है।
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बैंकों के आंकड़ों पर गौर करें तो बैंकों से होने वाले कुल लेन-देन का 30 प्रतिशत से ज्यादा लेन-देन कैशलेस हो गया है लेकिन जमा होने वाली धनराशि में गिरावट आई है। आज भी अधिकांश लोग दैनिक जरूरत की वस्तुओं को नकद खरीद रहे है। कपड़ा व्यापारी रोशन लाल कुरील, राजीव मोहन अग्रवाल की मानें तो दीपावली पर कपड़ों की जो खरीदारी हुई उसमें करीब 95 फीसदी नकद भुगतान ग्राहकों ने दिया है। वहीं सराफ शिव मोहन टंडन,वीरेंद्र रस्तोगी का कहना है कि अधिकांश ग्राहकों ने जेवर का नकद भुगतान किया है। इसी से सरकारी दावों का सच सामने आ रहा है।
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नेटवर्क ने बढ़ाई लोगों की दिक्कते
कैशलेस इकनॉमी में सबसे ज्यादा दिक्कत नेटवर्क की आ रही है। शहर में तो किसी तरह समस्या हल हो जाती लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पेटीएम, भीम ऐप तो दूर बैंकों से भुगतान मिलना भी मुश्किल हो गया। जिले में कई बार तो बैंकों में भुगतान न मिलने पर खाताधारकों की शाखा प्रबंधक से नोकझोंक भी हुई लेकिन नतीजा सिफर रहा।
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आरबीआई से कैश की मांग में आई 40 फीसदी कमी
बैंकों का दावा है कि पुराने नोट बंद किए जाने के एक साल के बाद हालात पूरी तरह से पटरी पर आ चुके हैं। उस समय आरबीआई से नई करेंसी की भारी मांग थी उसके मुकाबले अब करेंसी की मांग में काफी कमी आई है। एक अनुमान के मुताबिक नई करेंसी की मांग में 40 प्रतिशत की कमी आई है। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी कुछ बैकों में नई करेंसी न आने के कारण एटीएम खाली रहते हैं।
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बैंको के नियमों में बदलाव ने ग्राहक को तोड़ा भरोसा
पहले एटीएम से लेनदेन में कोई चार्ज नहीं लगता था लेकिन नोटबंदी के बाद चार बार से अधिक रुपये निकालने पर चार्ज लग जाता है। यही वजह है कि नौकरी पेशा ग्राहक चार बार में ही पूरा वेतन निकाल लेता है वहीं न्यूनतम धनराशि से कम होने पर बैंक खाते से चार्ज भी काट लेती है इसका नुकसान भी ग्राहक को उठाना पड़ रहा है।
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युवाओं में ऑनलाइन का क्रेज, किसान को नकद चाहिए
युवा वर्ग में ऑनलाइन बैंकिंग का क्रेज बढ़ा है। खरीदारी से लेकर रेल टिकट बुक कराने या फिर कैश ट्रांसफर करने तक युवा वर्ग स्मार्ट फोन के जरिए ऑनलाइन बैंकिंग का इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन गांव के किसान को नकद भुगतान की ही जरूरत रहती है। कारण साफ है कि उसे जरूरत का सामान आज भी नकद ही खरीदना पड़ रहा है।
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कैशलेस लेनदेन आसान और सुरक्षित है लेकिन नेटवर्क समस्या के कारण इसमें कठिनाई आ रही है। एक साल पहले जो हालात बन गए थे वह आज नहीं है लेकिन कैशलेस पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता है।
हरगोविंद मोदी, कारोबारी
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कहा जा रहा था कि नोटबंदी से ब्लैकमनी बाहर आएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। जितनी पुरानी करेंसी बाजार में थी वह ज्यादातर वापस हो गई। कैशलेस लेनदेन से उच्च वर्ग को फायदा हुआ लेकिन मध्यम और कमजोर वर्ग काफी परेशान हुआ।
अमित सिंह, राज्यकर्मी
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अचानक नोटबंदी से लोग परेशान हो गए थे लेकिन धीरे धीरे स्थितियां बदल रही हैं। कैशलेस लेनदेन बेहतर है लेकिन कई इलाकों में अभी भी नेटवर्क की समस्या के कारण दिक्कत आ रही है।
नरेंद्र सक्सेना, आम आदमी
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नोटबंदी के वक्त आई दिक्कते आज तक भूल नहीं पाए है। ऐसे फैसले लेने से पहले सरकार को जनता का ध्यान भी रखना चाहिए। आज भी एटीएम में कैश न होने पर परेशानी होती है।
स्मृति सिंह, गृहणी
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वर्जन-
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नोटबंदी के बाद बाजार तेजी से डिजिटल हुआ है। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो जिले की बैंकों से कुल लेन-देन का 23 फीसदी से ज्यादा कैशलेस हो रहा है। नोटबंदी से पहले ऐसा नहीं था। लोगों का रुझान तेजी से कैशलेस ट्रांजेक्शन की ओर बढ़ रहा है। इसके चलते रिजर्व से करेंसी की मांग में भी करीब 40 फीसदी तक की कमी आई है। धीरे-धीरे इकॉनमी कैशलेस हो रही है।-चंद्रशेखर जोशी, लीड बैंक मैनेजर
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लोगों की नजर फिर से आठ नवंबर पर
- आठ नवंबर 2016 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया तो उनका भाषण भाइयो और बहनों से शुरू हुआ था। नोटबंदी के बाद इस पर कई जुमले भी बने। आठ नवंबर को रात आठ बजे नोटबंदी को पूरा एक साल हो रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री इशारा कर चुके हैं कि आठ नवंबर को वह फिर से बड़ा फैसला लेंगे। ऐसे में लोगों की नजर आठ नवंबर को प्रधानमंत्री के इस फैसले पर फिर से टिकी हुई है।
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