शाहजहांपुर। ऐसा बहुत कम ही देखने और सुनने को मिलता होगा कि जो कुछ किसी ने लिखा हो, वह उसी के परिवार पर सटीक बैठ रहा हो। उम्र की राह में चुपचाप चला करते हैं, हम तो सूरज की तरह मौन ढला करते हैं। रोशनी है मगर आवाज न ढूंढो मुझमें, जिन को जलना है वो खामोश जला करते हैं। ये पंक्तियां कभी उस शख्स ने लिखी थीं, जिसे हिंदुस्तान ने अग्निवेश शुक्ल के नाम से जाना। आज ये पंक्तियां उनकी उस हमसफर मीनाक्षी अग्निवेश पर खरी उतर रही हैं। यह अलग बात है कि उनका हमसफर आज से 14 साल पहले दुनिया के मेले में बिछड़ गया। रंग से बेरंग हुई दुनिया फिर से सजाने की ललक में मीनाक्षी ने अपने को परिवार को स्थापित करने में खपा दिया।
मीनाक्षी की इस दुनिया में अग्निवेश शुक्ल के द्वारा छोड़े गए प्यार के वह दो फूल हैं, जिन्हें अग्निकेतु शुक्ल और अग्निशेखर शुक्ल के नाम से जाना जाता है। दोनों बेटों की खातिर मीनाक्षी ने पति से बिरासत में मिली साहित्यिक विरासत में व्यवसायिकता के रंग भरे। अब यही दोनों फूल उनका सहारा बन चुके हैं। व्यवसायिक दुनिया में रच-बस चुकी मीनाक्षी को आज भी पति का वे गौरवमयी पल याद हैं, जो कभी उन्होंने अपने जीवनसाथी के साथ मंचीय काव्यपाठ के दौरान साझा किए थे। अतीत के वे पल आज भी मीनाक्षी के जेहन में रचे-बसे हैं। मीनाक्षी ने कहा कि बहुत बार अग्निवेश की याद में कवि सम्मेलन कराने का मन बनाया, लेकिन हालातों ने साथ नहीं दिया। तमाम बड़े कवि गोपालदास नीरज, संतोषानंद, डॉ. उर्मिलेश, प्रदीप चौबे जैसे दिग्गजों ने हर समय हामी भरी, लेकिन उनके दिल ने गवारा नहीं किया। मौका लगा तो शीघ्र ही यह आयोजन भी होगा।
अग्निवेश के साहित्य के वह अनछुए गीत, मंचीय कविताएं भी शीघ्र ही उनके चाहने वालों के सामने होंगी। उनके रचित गीतों और मंचीय कविताओं का अनूठा संग्रह मैं अग्निवेश प्रकाशित हो रहा है। सौ गीतों से सुसज्जित यह अनुपम कृति प्रेस में है। इसे दुखद संयोग ही कहा जाएगा कि उनकी इस कृति का संपादन और रेखांकन भी चंद्रमोहन दिनेश ने ही किया है, लेकिन वह भी हमारे बीच नहीं हैं। गीत संग्रह मैं अग्निवेश का प्रकाशित करने का काम उनके सखा सुरेश कुमार खन्ना ही कर रहे हैं।
वर्तमान में प्रासंगिक उनका मुक्तक- तुम जलोगे अगर हिंदू वंश की संतान हो, तुम दफन होगे अगर इस्लाम की पहचान हो। पर कठिन है राह अब इंसानियत की इस कदर, वेकफन सड़ना पड़ेगा तुम अगर इंसान हो। या फिर- मेरे वतन में बस अगर इतना सा काम हो जाए, तो नंगी लाशों की ये मुश्किल तमाम हो जाए। नेता अगर लिबासों की थोड़ी सी सफेदी दे दें, तो गरीबों के कफन का इंतजाम हो जाए। समाज की सच्चाई को झकझोरने वाले मुक्तक- धूल सी मतलब परस्ती सभ्यता में भर गई, इस चमन को एक रेतीला मरुस्थल कर गई। दौर जहरीली हवाओं का चला कुछ इस तरह, आदमी जिंदा रहा पर आदमीयत मर गई। जैसे शब्दों का बांधने का हुनर रखने वाले अग्निवेश की पुण्यतिथि आठ जून को है। एक और खास बात है कि उनका जन्मदिन भी इसी माह की 12 तारीख को यानी चार दिन बाद ही है।