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शिव और सती के प्रेम ने उन्हें अमर और वंदनीय बना दिया-संत

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शाहजहांपुर। खिरनीबाग रामलीला मैदान में चल रही श्री शिव महापुराण कथा में संत प्रशांत प्रभु ने देवी सती की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों पर सती का पूजन और उनकी उपासना होती है। शिव और सती के प्रेम ने ही उन्हें अमर और वंदनीय बना दिया है।
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संत ने कहा कि राजा दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियां गुणवती थीं, पर दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो शक्ति-संपन्न हो। सर्व-विजयिनी हो। दक्ष ऐसी पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, वह तुम्हारे तप से प्रसन्न हैं और मैं स्वयं पुत्री रूप में उनके यहां जन्म लूंगी। उनका नाम होगा सती। वह सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करेंगी। फलत: भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में अलौकिक थीं। उन्होंने बाल्यकाल में ही कई ऐसे अलौकिक कृत्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मय की लहरों में डूब जाना पड़ा। जब सती विवाह योग्य हुई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता हुई। उन्होंने ब्रह्मा जी से परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या का अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अत: सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। कथा में मुख्य रूप से श्यामा कुमार मिश्रा, रामआसरे मिश्रा, जुगुल किशोर श्रीवास्तव, विष्णु मिश्रा, विवेक त्रिवेदी ने व्यास पीठ पर शिव जी की आरती संपन्न कराई।
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