प्रदेश सरकार ने सभी सरकारी अस्पतालों में प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत जेनरिक मेडिकल स्टोर खोलने का फैसला किया है। जेनरिक मेडिकल स्टोर खुलने के बाद जहां दवाओं में कमीशन का खेल खत्म होगा, वहीं आम लोगों को ब्रांडेड कंपनियों के मुकाबले 60 से 70 फीसदी तक कम कीमतों में दवाइयां मिल सकेंगी। जिले के सभी सीएचसी और पीएचसी पर जेनेरिक मेडिकल स्टोर खोलने का प्रस्ताव है। शासन स्तर से निर्देश मिलने के बाद काम चालू कर दिया जाएगा।
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दी जाने वाली दवाओं पर सरकार का मोटा बजट खर्च होता है। कुल दवा खरीद के बजट का 30 प्रतिशत तक बजट स्थानीय खरीद पर खर्च किया जा सकता है। सरकारी अस्पतालों में स्थानीय खरीद के नाम पर खेल होता है। ब्रांडेड कंपनियों की दवाओं में बजट खपाया जाता है। अस्पतालों में जेनरिक मेडिकल स्टोर खुलने के बाद सरकार ने स्थानीय खरीद इन्हीं मेडिकल स्टोर से शुरू कराने का भी फैसला किया है। इससे भी ज्यादा बुरा हाल निर्जी नर्सिंगहोम्स का है। ज्यादातर नर्सिंगहोम में मेडिकल स्टोर खुले हुए हैं। यहां डॉक्टर जो दवा लिखता है वह उसी के मेडिकल स्टोर पर मिलती है। दवाओं पर कमीशन तय होता है। गरीब तबके के लोगों की पहुंच से यह दवाएं दूर होती हैं। गली मोहल्लों में भी जेनरिक मेडिकल स्टोर खोले जाने हैं। इससे लोगों को सस्ती दवाएं मिल सकेंगी। इलाज में खर्च कम होगा।
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ब्रांडेड कंपनियां उठा रहीं मुनाफा-
आमतौर पर डॉक्टर महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं। इससे ब्रांडेड दवा कंपनियां मुनाफा कमाती हैं। हालांकि, बाजार में डॉक्टर की लिखी सस्ती दवाएं भी उपलब्ध होती हैं। डॉक्टर जो दवा लिखकर देता है उसी साल्ट की जेनरिक दवा सस्ते में मिल सकती है। महंगी दवा और उसी साल्ट की जेनरिक दवा की कीमत में 60 से 70 फीसदी तक का अंतर होता है। जेनेरिक दवाइयों का भी वही काम होता है जो किसी किसी ब्रांडेड कंपनी की दवा काम करती है। इसके बावजूद जेनरिक दवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा। जेनरिक दवाओं को लेकर आमजन को भी ज्यादा जानकारी नहीं है। इसका फायदा ब्रांडेड कंपनियां उठाती हैं। ब्रांडेड कंपनियों की दवाओं में डॉक्टरों का कमीशन भी तय होता है।
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मिल चुके हैं दो मेडिकल स्टोर के लाइसेंस
ड्रग इंस्पेक्टर देशबंधु विमल ने बताया कि जन औषधि केंद्र योजना के तहत जिले को मेडिकल स्टोर के दो लाइसेंस मिल चुके हैं। इन पर जेनेरिक दवाइयां मिलेंगी। एक मेडिकल स्टोर शहर के बहादुरगंज बाजार और एक पुवायां में खुलेगा। जल्द ही जिले में ब्लॉक स्तर पर भी इस तरह के मेडिकल स्टोर खोले जाएंगे।
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सिर्फ नाम का अंतर
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ब्रांडेड कंपनियों और जेनरिक दवाओं के बीच अंतर सिर्फ नाम का है। एक दवा को किसी ब्रांडेड कंपनी के नाम से बेचा जाता है। उसी बीमारी की जेनरिक दवा को बिना किसी ब्रांडेड कंपनी के नाम से बाजार में बेचा जाता है। एक ही बीमारी की ब्रांडेड कंपनी और जेनरिक दवाई की कीमतों में 70 प्रतिशत तक का अंतर होता है। जबकि दोनों दवाइयों का काम एक ही होता है। अगर लोगों को आसानी से जेनरिक दवाइयां मिलेंगी तो इलाज में खर्च कम होगा।
- डॉ. सत्य प्रकाश मिश्रा
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धरातल पर आए योजना
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डॉक्टर अपने मरीजों को वही दवा लिखते हैं, जिससे वह जल्द स्वस्थ हो। जिस दवा पर डॉक्टर को भरोसा हो। यह बात सही है कि जेनरिक दवाओं के मुकाबले ब्रांडेड कंपनियों की दवाएं महंगी हैं। लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार का अच्छा कदम है। खोले जाने वाले मेडिकल स्टोर्स पर दवाओं की उपलब्धता भी जरूरी है। जाहिर है कि अगर सरकार की योजना धरातल पर आती है तो इसका सीधा लाभ लोगों का होगा। इलाज सस्ता होगा।
- डॉ. राजीव सिंह
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वर्जन-
जिले के सभी सीएचसी और पीएचसी के साथ जिला अस्पताल में जेनरिक दवाओं के जन औषधि केंद्र खोले जाएंगे। इसके लिए शासन को प्रस्ताव के साथ सभी सरकारी अस्पतालों की सूचियां भी भेजी गई हैं। जेनरिक मेडिकल स्टोर को जल्द मंजूरी मिलने की उम्मीद है। अस्पतालों में जन औषधि केंद्र होने का सीधा फायदा गरीबों को मिलेगा। सरकारी अस्पतालों में जेनरिक मेडिकल स्टोर खोलने से पहले सरकार का जोर है कि यहां दवाओं की उपलब्धता रहे। इन मेडिकल स्टोर से दवाओं में कमीशन का खेल रुकेगा।
- डॉ. आरपी रावत, सीएमओ