3.5 क्विंटल प्रतिबंधित थाई मांगुर की जिले में रोजाना हो रही खपत
बूचड़खानों की बहुलता वाले जनपदों से लाई जा रही थाई मांगुर
उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध के बावजूद नहीं बना प्रभावी कानून
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर।
जेनेटिक रोगों की वाहक होने के कारण उत्पादन और बिक्री पर देश के सभी राज्यों में प्रतिबंध लागू होने के बावजूद जिले के बाजारों में थाई मांगुर प्रजाति की 3.5 क्विंटल मछली रोजाना खप रही है। हालांकि, मत्स्य विभाग के अधिकारी जिले की किसी भी तहसील में थाई मांगुर का उत्पादन होने से इनकार करते हैं, लेकिन यह मानने से गुरेज नहीं करते कि प्रतिबंध के बावजूद प्रभावी कानून नहीं बनाए जाने से आसपास के अन्य जनपदों से इसे बिक्री के लिए यहां बड़े पैमाने पर लाया जा रहा है। जंतु विज्ञानी और चिकित्सा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि थाई मांगुर खाने वाले मछली के शौकीनों में कई वंशानुगत समस्याओं और रोगों की रफ्तार को बढ़ावा मिलने की आशंका बढ़ जाती है।
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जिले में प्रतिवर्ष हो रहा 1308 मीट्रिक टन मत्स्य उत्पादन
मत्स्य विभाग ने मछली पालन के लिए जिले की विभिन्न तहसीलों में 1453.317 हेक्टेयर क्षेत्रफल के 1476 तालाब मत्स्य पालकों को आवंटित किए हैं। इन तालाबों में भारत सरकार से स्वीकृत रोहू, कतला, नैन, ग्रास कार्प, चायनीज (कॉमन कार्प) और सिल्वर कार्प प्रजाति की मछलियों के बीज डाले जाते हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार इन तालाबों से प्रतिमाह औसतन 109 मीट्रिक टन संस्तुत प्रजातियों की मछली का उत्पादन होता है। अधिकारियों के अनुसार सकल सालाना मत्स्य उत्पादन की दस फीसदी थाई मांगुर भी जिले के बाजारों में हाथों-हाथ ली जा रही है।
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मांस की उपलब्धता वाले जनपदों में धड़ल्ले से हो रहा उत्पादन
जहां एक ओर सरकार द्वारा संस्तुत मत्स्य प्रजातियां तालाबों के कवक, शैवाल और अन्य वनस्पतियों पर निर्भर रहकर बढ़ती हैं, वहीं थाई मांगुर पूरी तरह मांसाहारी जलजीव है। यह प्रजाति तालाब में पाली जाने वाली अन्य सभी प्रजाति की मछलियों को चट कर जाती है। इसलिए इसका उत्पादन बहुधा उन जिलों में अधिक होता है, जहां स्लाटर हाउस अधिक हैं। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार यूपी में मुरादाबाद, बरेली, रामपुर, दुबग्गा लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव और अलीगढ़ आदि जनपदों में थाई मांगुर का उत्पादन हो रहा है क्योंकि वहां इस प्रजाति के लिए आहार के तौर पर मत्स्यपालकों को बूचड़खानों से मांस अपशिष्ट आसानी से और मुफ्त में हासिल हो जाता है।
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पंगाश प्रजाति की मछली थाई मांगुर का बनेगी बेहतर विकल्प
अभी तक आंध्र प्रदेश से मंगाई जा रही पंगाश प्रजाति की मछली थाई मांगुर का बेहतर विकल्प मानी जा रही है क्योंकि इसमें भी सिर्फ एक कांटा होता है और वनस्पतियों पर पलने के बावजूद छह माह में एक से डेढ़ किलो वजन की हो जाती है। मत्स्य विभाग के सहायक निदेशक आरपी भारती के अनुसार जिले में बाहर से आने वाली थाई मांगुर को हतोत्साहित करने के लिए स्थानीय स्तर पर सीलन के नाम से प्रचलित पंगाश के पालन को बढ़ावा देने की योजना आरंभ की जा रही है। उप्र मत्स्य विभाग तकनीकी कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री प्रदीप शुक्ला कहते हैं कि संगठन के स्तर से की गई फिशरीज एक्ट बनाने की मांग पूरी होने पर आयातित थाई मांगुर की बिक्री पर रोक लगाना आसान हो जाएगा।
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फोटो 19 में।
थाई मांगुर का आकार बढ़ाने वाला हार्मोन समस्या का कारण
थाई मांगुर तेजी से बढ़ती है और इसका ग्रोथ हार्मोन मानव शरीर में कई समस्याएं पैदा करता है। देशी मांगुर से निर्मित कार्ड लिवर ऑयल कई बीमारियों में काम आता है, लेकिन थाई मांगुर कलर ब्लाइंडनेस, बौनापन, हीमोफीलिया जैसी समस्याओं को बढ़ावा देती है। जिन लोगों को हरे-लाल रंग में फर्क करना कठिन हो या फिर घाव होने पर प्रोटीन की कमी से रक्त का थक्का न बनने की समस्या हो, उन्हें थाई मांगुर से परहेज करना चाहिए।
-डॉ. जमील अहमद, विभागाध्यक्ष, जंतु विज्ञान, जीएफ कालेज
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फोटो 18 में।
थाईलैंड की मछलियों में पाए जा चुके मनुष्यों जैसे बैक्टीरिया
जिन परिवारों में यूर्मेटिक आर्थराइटिस, डाउन सिंड्रोम अर्थात मंद बुद्धि, लीवर संबंधी बीमारियों का इतिहास रहा हो, उनमें इन शारीरिक समस्याओं के बैक्टीरियां जड़ें जमाए रहते हैं। यह बैक्टीरिया गर्भवती महिलाओं से बच्चों में जन्म से आठ-दस दिन के अंदर चले जाते हैं। शोध में यही बैक्टीरिया थाईलैंड की सील्स और प्रॉन में भी पाए गए। संभवत: इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए थाई मांगुर को प्रतिबंधित किया गया। वंशानुगत बीमारियों की वाहक मछलियों पर विभिन्न देशों में शोध जारी हैं।
-डॉ. राजीव सिंह, फिजीशियन, मंडी मोड़