हरिहरपुर। फाल्गुन का महीना शुरू होते ही आज भी गांव में लोग ढोल और नगाड़े की थाप पर फाग गीतों का आनंद लेते हैं। फाग गीतों में सबसे अधिक गाए जाने वाले गीत कवि रंगपाल की रचनाएं हैं ।
आज से करीब डेढ़ सदी पूर्व नगर पंचायत हरिहरपुर में जन्में महाकवि रंगपाल ने फाग विधा की जीवंत रचनाओं के जरिए हिंदी साहित्य में अहम मुकाम हासिल किया है। ब्रजभाषा और अवधी में उनकी कृतियां बेहद उम्दा हैं। हालांकि महाकवि रंगपाल की रचनाओं में शृंगार, वीर रस, देशभक्ति के गीत सहित दादर, खेमटा, चैता, गजल और अन्य रचनाएं भी हैं लेकिन उनके लिखे फाग गीतों को काफी लोकप्रियता मिली। कवि रंगपाल की रचनाओं पर शोध कर चुके डॉ. सुधांशु ने बताया कि कवि रंगपाल जैसी लोक गायकी की रचना शायद ही किसी कवि की रचनाओं में मिलती हो, भारतेंदु युग के कवि रहे रंगपाल को खुद भारतेंदु जी ने महाकवि की उपाधि से अलंकृत किया था। उन्होंने अपनी रचनाओं में हर उस पहलू को छुआ जिसे उन्होंने महसूस किया। प्रकृति के सौंदर्य सहित महारानी पद्मावती की वीरगाथा अपने पालतू कुत्ते के बिरह में लिखी मित्तू विरह और खगनामा शीर्षक से प्रकाशित पुस्तकें पशु, पक्षियों के प्रति कवि की संवेदना दर्शाती हैं। उन्होंने रानी पद्मावत के बारे में लिखा है कि धीरता धर्म उदारता आगरी, चंडिका वीरता माहिं प्रमानी, प्राण प्यारे के संग सनेहु जो स्वर्ग गई पद्मावत रानी।
हरिहरपुर में 20 फरवरी सन 1864 में जन्में महाकवि रंगपाल की माता सुशीला देवी को संस्कृत और हिंदी भाषा के साथ ही संगीत की भी गहरी समझ थी। इसीलिए बिना स्कूल की शिक्षा ग्रहण किए ही कवि को साहित्य लेखन और संगीत में महारत हासिल था। उनके फाग गीतों में ''''ऋतुपति गयौ आय हाय गुंजन लगे भंवरा.....,बलम सोए रहो अबहीं दीन्हें बहिंया गले डारि....,लिए जा मधुबनवा संदेशा हो बटोही.... जैसे फाग गीतों को ढोल और नगाड़े की थाप पर आज भी लोग गाते हैं।