कताई मिल चलती तो और बढ़ जाती रौनक
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संतकबीरनगर। इंटर की कक्षा में महान साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी का एक निबंध पढ़ा होगा गेहूं बनाम गुलाब। पहली लाइन थी कि गेहूं हम खाते हैं, गुलाब सूंघते हैं। एक से शरीर पुष्ट होता है, दूसरे से मानस तृप्त होता है। मगहर महोत्सव के दौरान बुजुर्ग जुबैर अहमद से बातचीत के दौरान यह निबंध बरबस ही याद आ गई। मगहर के संत कबीर कताई मिल के इस कर्मचारी का मानना था कि कताई मिल चल रही होती तो महोत्सव का उल्लास चार गुना अधिक होता।
मगहर कस्बा कपड़े की बुनाई के लिए जाना जाता है। बुनकर परिवारों की बहुलता वाले इस कस्बे में वर्ष-1977 में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से सहकारिता पर आधारित संत कबीर कताई मिल की स्थापना की गई थी। इस मिल में हेड फीटर के पद पर कार्यरत रहे मगहर कस्बा निवासी जुबैर अहमद बताते हैं कि यहां करीब डेढ़ हजार कर्मचारी कार्य करते थे। वर्ष-1997 में जब मिल बंद हुई उस वक्त केवल वेतन मद में ही करीब 33 लाख रुपये का भुगतान होता था। आर्थिक संपन्नता का असर मेले में भी दिखता था। कताई मिल के ही कर्मचारी रहे रइस अंसारी बताते हैं कि कर्मचारियों का परिवार भी साथ रहता था लिहाजा बाजार की दुकानें हर वक्त गुलजार रहा करती थीं। सस्ता सूत मिलने के चलते यहां के बुनकर भी कपड़ा बुनकर अच्छी आमदनी करते थे। खिचड़ी के अवसर पर जब मेला लगता था तो लोग जमकर खरीदारी करते थे। मकसूदूल हसन उल्टा सवाल करते हैं कि अगर जेब में पैसा न रहे तो महोत्सव का आनंद कैसे लें। मेले में साथ गए बच्चे कहीं खिलौने की जिद करेंगे तो कभी झूले पर चढ़ना चाहेंगे। अगर पैसा नहीं है तो मेला में चुपचाप रहना मजबूरी है।
अब्दुल कलाम अंसारी भी मानते हैं कि कताई मिल की बंदी व बुनकरों का रोजगार खत्म होने से लोग मायूस हैं। महोत्सव का आयोजन होने से दुकानों व कस्बे में चहल-पहल बढ़ी है। लोगों की जेब भरी होती तो महोत्सव की भीड़ चार गुना बढ़ जाती।