संतकबीरनगर। हैंसर ब्लाॅक के मिश्रौलिया गांव में मार्ग दुर्घटना में सास-बहू की मौत का मामला प्रशासन के हर घर शौचालय अभियान के दावे पर सवाल उठा रहा है। कारण यह है कि अगर घर में अगर शौचालय होता तो शायद सास-बहू की जान न जाती और न ही गर्भवती बहू अस्पताल में जिंदगी से जूझ रही होती।
जनपद को खुले में शौच से मुक्त होने के कई दावे किए जाते हैं। जनपद को खुले में शौच से मुक्त जिला भी घोषित कर दिया गया। लेकिन वर्तमान स्थितियां यह बताती हैं कि यह दावा पूरी तरह से कोरा और किताबी है। इस कागजी दावे की हकीकत से परे आज भी गावों में अधिकांश लोग खुले में शौच करते हैं। इस वर्ष स्वच्छ भारत अभियान के तहत जिले में 21417 शौचालयों का निर्माण कराया जाना था। इनमें से 16064 शौचालय बन गए।
जबकि बजट के अभाव में अभी 3021 शौचालय नहीं बनाए जा सके हैं। 3021 शौचालय विहीन परिवार आखिर शौच कहा करते हैं, यह भी व्यवस्था पर एक प्रश्न है। प्रश्न तो यह भी है कि जब इतने लोग शौचालय विहीन हैं, तो जिले को शौच से मुक्त जिला घोषित कैसे कर दिया गया। हैसर क्षेत्र में बने हैं 72 सामुदायिक शौचालय : हैसर विकास खंड जिस क्षेत्र में यह घटना हुई है वहां पर कुल 72 सामुदायिक शौचालय बनाए गए हैं। इन शौचालयों की स्थिति यह है कि इनमें से अधिकांश सामुदायिक शौचालय खुलते ही नहीं हैं। उन पर ताला लगा रहता है। यह महिलाएं जिस मिश्रौलिया गांव की थीं, उस गांव में भी सामुदायिक शौचालय बना हुआ है। लेकिन वह शौचालय दूसरे टोले पर है। जिसके चलते इस टोले की महिलाएं उसका उपयोग नहीं कर पाती थीं। ्