जिला अस्पताल की ओपीडी में परामर्श देते बालरोग विशेषज्ञ
संतकबीरनगर। बच्चों को कम उम्र में खेलने के लिए थमाया गया मोबाइल अब उनके अभिभावकों के लिए मुसीबत बन गया है। बच्चों की समय से बोलने की क्षमता पर असर पड़ रहा है। जिला अस्पताल में स्पीच थेरेपी न होने से अभिभावक परेशान हैं। हर सप्ताह इस तरह के दो से तीन मरीज आ रहे हैं।
समय के साथ घर-परिवार का माहौल अब बदल चुका है। पहले छोटे बच्चों को खेलने के लिए परिजन बाजार से तरह-तरह खिलौने दिया करते थे, लेकिन अब अभिभावक खिलौनों के स्थान पर उनके हाथ में मोबाइल थमाते हैं। इससे बच्चों के लिए यह मोबाइल आदत में शुमार हो गया है।
इसका असर उनके विकास पर भी देखा जा रहा है। सबसे अधिक समस्या बच्चों को बोलने की क्षमता में आ रही है। देखा जा रहा है कि जिस बच्चे को दो साल की उम्र तक बोलना शुरू देना चाहिए था वह अब पांच से छह साल की उम्र में बोलना चालू करता है। उसमें भी यह साफ तरीके से नहीं बोल पाता।
जिला अस्पताल में हर सप्ताह दो से तीन बच्चे आ रहे हैं। लेकिन जिला अस्पताल में स्पीच थेरेपिस्ट के नहीं होने से बाल रोग विशेषज्ञ के माध्यम से परिजनों को मोबाइल से दूरी बनाने की सलाह दी जा रही है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. डीपी सिंह ने बताया कि इस तरह के बच्चे आ रहे हैं। उनका इलाज किया जा रहा है। इसके साथ ही परिजनों को बच्चों से मोबाइल की लत छुड़ाने की सलाह दी जाती है।