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आजादी महोत्सव: शहीद रामप्रीत ने पुलवामा में लिखी थी शौर्य की गाथा, तीन आतंकियों को सुलाया था मौत की नींद

Sat, 13 Aug 2022 10:47 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, संतकबीरनगर।

सार

रामप्रीत चौरसिया की वर्ष 1998 में बीएसएफ में भर्ती हुई। उन्हें वर्ष 2001 में कश्मीर के पुलवामा में 52वीं बटालियन में तैनाती मिली। सितंबर 2003 को नरवानी गांव के एक घर में लश्कर के आतंकियों के छिपे होने का खुफिया सूचना मिली। इस ऑपरेशन की जिम्मेदारी बीएसएफ की 52वीं बटालियन को सौंपी गई।
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पुलवामा में 19 साल पहले शहीद हुए रामप्रीत चौरसिया की फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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करीब 19 साल पहले जिले के शहीद सैनिक ने पुलवामा में शौर्य गाथा लिखी थी। आतंकियों से मुठभेड़ में उसके रायफल से निकली गोली ने लश्कर के तीन आतंकियों का सीना छलनी कर दिया था। शहीद सैनिक की वीरगाथा याद कर क्षेत्र के लोगों का सीना आज भी गर्व से चौड़ा हो जाता है।

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नाथनगर ब्लॉक के अलीनगर गांव के रहने वाले रामप्रीत चौरसिया की वर्ष 1998 में बीएसएफ में भर्ती हुई। उन्हें वर्ष 2001 में कश्मीर के पुलवामा में 52वीं बटालियन में तैनाती मिली। सितंबर 2003 को नरवानी गांव के एक घर में लश्कर के आतंकियों के छिपे होने का खुफिया सूचना मिली। इस ऑपरेशन की जिम्मेदारी बीएसएफ की 52वीं बटालियन को सौंपी गई।

टीम में रामप्रीत चौरसिया भी शामिल थे। जिस घर में आतंकी छिपे थे, उस घर को टीम ने घेरकर फायरिंग करनी शुरू कर दी। मुठभेड़ में जब टीम के एएसआई और कांस्टेबल जख्मी हो गए, तब रामप्रीत चौरसिया ने मोर्चा संभाला और घर में छिपे तीनों आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था।
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इस मुठभेड़ में रामप्रीत चौरसिया भी घायल हो गए। उन्हें सेना के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान 17 सितंबर 2003 को उनकी मौत हो गई। अलीनगर के समीप कठिनइया नदी पुल के पास शहीद की समाधि बनी हुई है। यहां से होकर गुजरने वाले लोग आज भी शहीद की समाधि पर सिर झुकाकर गर्व महसूस करते हैं।

 

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मरणोपरांत मिला था वीरता पुरस्कार

वर्ष 2005 में शहीद रामप्रीत चौरसिया को मरणोपरांत राष्ट्रपति पुलिस पदक फॉर गैलेंट्री अवॉर्ड (वीरता पुरस्कार) से सम्मानित किया गया था। रामप्रीत चौरसिया अपने पीछे माता, पिता, पत्नी व पांच बच्चों को छोड़ गए थे। जिस समय सैनिक रामप्रीत चौरसिया शहीद हुए थे, उस समय उनके बड़े बेटे विनय कुमार चौरसिया की 13 साल थी।

मासूमों के सिर से उठता गया बड़ों का साया
2010 में शहीद की पत्नी कुशुमावती देवी की बीमारी के चलते मौत हो गई। शहीद की पत्नी की मौत से परिवार को पेंशन मिलनी बंद हो गई। शहीद के बड़े बेटे विनय कुमार चौरसिया को नौ साल बाद बीएसएफ में नियुक्ति मिल गई, लेकिन छोटे भाई-बहनों और बुजुर्ग दादा-दादी को छोड़कर विनय चौरसिया नौकरी नहीं कर सके और नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
 
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