दोहे बताते हैं सत्य के कितने करीब थे कबीर: कुमार विश्वास
मगहर/संतकबीरनगर। कबीर महान सूफी संत थे। कबीर ने दोनों समुदायों को बेबाकी के साथ फटकार लगाई और कहा दोनों जनि रहिया बिगाड़े ये भाई-हिंदू अपनी करे बड़ाई....,वहीं मुस्लिम को मुसलमान के पीर औलिया मुर्गी मुर्गा ..। भारत में पहला नोबल पुरस्कार 1913 में रविंदनाथ टैगोर को नहीं, बल्कि कबीर को मिला है, क्योंकि रविंद्र नाथ टैगोर ने कबीर के 100 दोहों को अंग्रेजी में अनुवाद कर वन हंड्रेड पोयम ऑफ कबीर किताब लिखी थी। यह बातें मंगलवार को कवि व लेखक कुमार विश्वास ने कबीर चौरा परिसर आकर समाधि व मजार के दर्शन करने के बाद कही।
उन्होंने आगे कहा कि यहां लिखे उनके दोहे सांच बराबर तप नहीं व कबीर जब हम पैदा हुए.., आज भी जीवंत कर देने वाले हैं। कबीर सत्य के कितने करीब थे, यह उनकी शब्दावली से जाना जा सकता है। यह बहुत ही शांति का स्थान है। यहां आकर काफी शांति मिली। उन्होंने बताया कि 28 वर्ष पहले कबीर दर्शन को आए थे और आज पुन: उनके दर्शन प्राप्त हुए। उन्होंने मस्ती में धीरे से गाड़ी हांको मेरे भाई गाङी वान.., कबीरा जब हम पैदा हुए.., क्या काशी क्या ऊसर मगहर जो पाय हृदय राम बस मोरा.., आदि दोहों को भी गुनगुनाया। इससे पूर्व महंत विचारदास ने सद्गुरु कबीर के बारे में विस्तार से चर्चा की। इस दौरान डॉक्टर हरिशरण शास्त्री ने अपनी लिखी हुई किताब कबीर संत भजनावली, जिन ढूंढा तीन पैईया, पंडित बाद बदंते झूठा, उन्हें भेंट की। इस मौके पर संत अमरीक सिंह, संत शांतिदास, संत केशव दस, बाबूराम दास, डॉक्टर हरिशरण शास्त्री, राम सरन दास, विनोद दास, विजय तिवारी आदि मौजूद रहे।