संतकबीरनगर। दुधारा क्षेत्र के देवरिया लाल गांव निवासी मौलाना शमशुल हुदा खान के खलीलाबाद में मदरसे की जमीन के बैनामे का मामला अब साफ हो गया है। एसडीएम खलीलाबाद की अदालत ने 14 अगस्त को दिए अपने आदेश में 640 वर्गमीटर जमीन को कृषि भूमि माना है। अदालत ने पाया कि बैनामे में भूमि को आवासीय बताकर खरीदा गया लेकिन भूमि की प्रकृति बदलने के लिए सक्षम अधिकारी से आवश्यक घोषणा नहीं कराई गई।
आदेश में यह भी कहा गया है कि केवल आवासीय प्रयोजन के लिए भूमि खरीद लेने या मौके पर निर्माण कर लेने से कृषि भूमि की प्रकृति अपने आप नहीं बदल जाती।
मामला खलीलाबाद स्थित गाटा संख्या-154 से जुड़ा है। कुल 0.192 हेक्टेयर में से 0.064 हेक्टेयर यानी 640 वर्गमीटर भूमि का बैनामा दो सितंबर 2014 को कुल्लियतुल बनातिर रजविया एजूकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी के पक्ष में कराया गया। दस्तावेज में संस्था के प्रबंधक तौसीफ रजा खान और सरपरस्त शमशुल हुदा खान का नाम दर्ज था।
एसडीएम अदालत में हुई सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि बैनामे के समय शमशुल हुदा खान ब्रिटेन के नागरिक थे। अदालत ने शमशुल हुदा खान के ब्रिटिश पासपोर्ट, नागरिकता संबंधी प्रमाणपत्र और ओसीआई दस्तावेजों का परीक्षण किया।
आदेश के मुताबिक उसे 19 दिसंबर 2013 को ब्रिटेन की नागरिकता मिली थी। इसके बाद दो सितंबर 2014 को विवादित भूमि का बैनामा कराया गया। अदालत ने माना कि बैनामे से पहले राज्य सरकार की लिखित अनुमति लिए जाने का कोई प्रमाण पत्रावली में नहीं मिला।
राजस्व अदालत के मुताबिक विदेशी नागरिक की ओर से भूमि अर्जित करने के मामले में संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत पूर्व अनुमति आवश्यक थी। अदालत ने अनुमति के अभाव में बैनामे को शून्य, अवैध और अप्रवर्तनीय माना। संवाद
आवासीय जमीन बताई, लेकिन कृषि भूमि ही रही
इस मामले का अहम पहलू भूमि की प्रकृति को लेकर रहा। सुनवाई में यह तर्क सामने आया कि बैनामे में भूमि को आवासीय बताकर खरीदा गया था और उसी आधार पर स्टांप शुल्क दिया गया लेकिन अदालत ने इसे भूमि की मूल प्रकृति बदलने के लिए पर्याप्त नहीं माना। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि विवादित भूमि को कृषि से गैर-कृषि भूमि में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक घोषणा नहीं कराई गई थी। केवल कॉलोनी, भवन या आवासीय उपयोग के लिए भूमि खरीद लेने से उसकी प्रकृति स्वत: नहीं बदलती। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि बैनामे के समय स्थल पर किसी निर्माण का उल्लेख नहीं था और आसपास की भूमि पर काश्तकार कृषि कार्य कर रहे थे।
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मदरसा बनने के बाद भी आबादी की घोषणा नहीं
अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि भूमि पर बाद में शैक्षिक संस्था की ओर से भवन का निर्माण किया गया। हालांकि, भूमि को आबादी घोषित कराने की कार्रवाई नहीं हुई। आदेश में कहा गया है कि कृषि भूमि का गैर-कृषि उपयोग शुरू कर देने मात्र से उसकी राजस्व प्रकृति नहीं बदलती। इसके लिए विधि के अनुसार सक्षम स्तर से घोषणा जरूरी है। यानी मदरसा भवन का निर्माण होने के बावजूद राजस्व अभिलेखों में भूमि की मूल प्रकृति कृषि भूमि ही बनी रही। इसी आधार पर एसडीएम अदालत ने आवासीय भूमि के रूप में किए गए बैनामे के तर्क को स्वीकार नहीं किया।
पहले नामांतरण भी हुआ था निरस्त
प्रकरण में भूमि के नामांतरण को लेकर भी कार्रवाई हो चुकी थी। बैनामे के आधार पर 2014 में संस्था के पक्ष में नामांतरण आदेश पारित हुआ था। बाद में तथ्यों की जानकारी सामने आने पर उक्त नामांतरण आदेश को विधि विरुद्ध मानते हुए निरस्त कर दिया गया। इसके बाद हल्का लेखपाल की रिपोर्ट के आधार पर भूमि को राज्य सरकार में निहित करने के लिए धारा 104/105 के तहत कार्रवाई शुरू हुई। एसडीएम अदालत में कई तारीखों पर नोटिस और समन की कार्रवाई हुई। आदेश में दर्ज है कि शमशुल हुदा खान और संबंधित शैक्षिक संस्था की ओर से सुनवाई में प्रभावी आपत्ति दाखिल नहीं की गई। इसके बाद उपलब्ध अभिलेखों और साक्ष्यों के आधार पर मामले का निस्तारण किया गया।
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हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला
इस जमीन को लेकर पहले जिलाधिकारी स्तर पर भी कार्रवाई हुई थी। अदालत के आदेश में दर्ज है कि जिलाधिकारी के आदेश के खिलाफ संबंधित शैक्षिक संस्था की ओर से हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट ने पूर्व की राजस्व कार्यवाही को क्षेत्राधिकार के आधार पर निरस्त करते हुए नियमानुसार धारा 103 के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। इसके बाद एसडीएम न्यायालय में मौजूदा कार्यवाही शुरू हुई।
एसडीएम अदालत के आदेश में यह भी कहा गया है कि संस्था और शमशुल हुदा खान की भूमिका को बैनामे के संदर्भ में अलग-अलग नहीं माना जा सकता। बैनामे में संस्था के प्रबंधक के साथ शमशुल हुदा खान को सरपरस्त के रूप में दर्ज किया गया था।
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640 वर्गमीटर भूमि और निर्माण भी सरकार में निहित
14 अगस्त के आदेश में एसडीएम खलीलाबाद ने हल्का लेखपाल की 26 मई 2026 की रिपोर्ट स्वीकार करते हुए गाटा संख्या 154 मी. की 0.064 हेक्टेयर यानी 640 वर्गमीटर भूमि से संबंधित संस्था का नाम राजस्व अभिलेखों से हटाने का आदेश दिया। भूमि और उस पर स्थित समस्त संरचना/निर्माण को भी राज्य सरकार में सरकारी संपत्ति के रूप में निहित करने का आदेश दिया गया है। साथ ही विक्रेता और क्रेता के हित समाप्त करने तथा आदेश की प्रति राजस्व अभिलेखों में अनुपालन के लिए तहसीलदार खलीलाबाद को भेजने का निर्देश दिया गया है।
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अब मदरसा ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर निगाह
एसडीएम अदालत के इस आदेश के बाद अब मदरसा भवन को लेकर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर है। अदालत ने भूमि के साथ उस पर मौजूद संरचना/निर्माण को भी राज्य सरकार में निहित घोषित किया है। ऐसे में राजस्व आदेश के अनुपालन और संबंधित अन्य विभागीय कार्रवाई के बाद मदरसा भवन के संबंध में भी प्रशासनिक कदम का रास्ता साफ होने की संभावना है। एसडीएम अदालत के 14 अगस्त 2026 के आदेश में भूमि को कृषि भूमि मानने, आबादी की घोषणा न होने और बैनामे को शून्य मानकर भूमि व निर्माण को राज्य सरकार में निहित करने संबंधी निष्कर्ष दर्ज हैं।
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उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम मामले की सुनवाई पूरी की गई। आदेश की प्रति न्यायालय को प्रेषित कर दी गई है।
-हृदयराम त्रिपाठी, एसडीएम खलीलाबाद