बड़ा बदलाव तभी जब बेटियां झिझक तोड़ आगे बढ़ें
राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर हुई विचार गोष्ठी में विशेषज्ञों ने छात्राओं में भरा जोश
अमर उजाला की अपराजिता मुहिम के तहत राजकीय कन्या इंटर कालेज में हुआ कार्यक्रम
अमर उजाला ब्यूरो
संतकबीरनगर। बेटियां जब तक संकोच त्यागकर खुद आगे नहीं बढ़ेंगी, तब तक समाज उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं देगा। दो दशक में महिलाओं के प्रति नजरिये में परिवर्तन आया है लेकिन अभी यह शुरुआती दौर है। बदलाव की इस कहानी को नया आयाम देने की जिम्मेदारी बेटियों पर ही है।
ये बातें बुधवार को राष्ट्रीय बेटी दिवस के अवसर पर अमर उजाला की अपराजिता मुहिम के तहत राजकीय कन्या इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानाचार्य आशा यादव ने कहीं। उन्होंने कहा कि बेटियां हर क्षेत्र में सबल हों, इसके लिए प्रयास हो रहा है। इसका असर भी दिख रहा है लेकिन बड़ा बदलाव तभी दिखेगा, जब बेटियां खुद संकोच व झिझक तोड़कर आगे बढ़ेंगी। शिक्षिका ऊषा वर्मा ने कहा कि लड़कियां शोषण का शिकार तब बनती हैं जब वह अपने हर कार्य के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाती हैं। जागरूकता कार्यक्रमों का असर होने लगा है। अब लोग बेटियों को पढ़ाने और नौकरी कराने के प्रति उत्सुक हो रहे हैं।
समारोह में सरस्वती पाठक, निम्मी साहू, एकता और संध्या ने भी विचार व्यक्त किए। इस दौरान सलोनी गौड़, जीनत फातिमा, रागिनी प्रजापति, पूजा शर्मा, शशिकला, स्वाती कन्नौजिया, मनोरमा, शबनम खातून, शिवानी गौतम, शिवांगी मौर्या, वर्षा सिंह आदि मौजूद रहीं।
बेटियों ने ली अपराजिता बनने की शपथ
कार्यक्रम में मौजूद छात्रा पूनम शर्मा, प्रीती गुप्ता, राधिका यादव आदि 83 छात्राओं ने अभियान से प्रेरित होकर खुद को अपराजिता बनाने की शपथ ली। छात्राओं ने शपथ पत्र भरे और अन्य छात्राओं व पड़ोस की लड़कियों को भी अभियान से जुड़ने के लिए प्रेरित करने का आश्वासन दिया। उन्होंने अमर उजाला के अभियान की सराहना की और कहा कि आधी आबादी को हक दिलाने की यह कोशिश भविष्य में बड़े बदलाव के लिए जमीन तैयार करेगी।
छात्राएं बोलीं
पढ़ाई के लिए अवसर मिला है लेकिन अभी माहौल वैसा नहीं है जहां लड़कियां स्वतंत्र व निर्भीक होकर अपना कार्य कर सकें। स्कूल आते-जाते वक्त अभिभावक अनहोनी की आशंका से डरे रहते हैं। इससे मुक्ति मिलना बहुत जरूरी है।
- गोल्डी मौर्या
लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। घर वालों का भी पूरा सहयोग मिल रहा है लेकिन अब भी लोगों के मन में बेटी व बेटे का फर्क है। इसे सफलता हासिल करके ही दूर किया जा सकता है। इसके बाद ही समाज की सोच बदलेगी।
- सना अंसारी
पढ़ाई और नौकरी से महिलाओं की स्थिति बदली है लेकिन यह सब अभी शुरुआती दौर में है। अब भी बेटियों को बेटों की अपेक्षा अधिक बंदिशें झेलनी पड़ती हैं। अपराजिता जैसा अभियान बेटियों की राह की रुकावट दूर करेगा।
- शाहिन खातून
पहले महिलाएं ही बेटियों को बेटों से कमतर मानती थीं लेकिन अब बदलाव आ रहा है। अब बेटियों को भी बेटों की तरह पढ़ने और नौकरी करने की आजादी मिल रही है। बेटियां बड़े पदों तक पहुंच रही हैं। हालात तेजी से बदल रहे हैं।
- शायमा खातून