पडरौना। हिंदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक, निबंधकार, कहानीकार डॉ. नामवर सिंह के निधन से संपूर्ण हिंदी साहित्य के आकाश का वह सूर्य अस्त हो गया, जिसकी कमी हिंदी साहित्य जगत को हमेशा महसूस होगी। डॉ. नामवर सिंह हजारी प्रसाद द्विवेदी परंपरा के अंतिम बड़े आलोचक थे।
ये बातें बुधवार को यूएनपीजी कॉलेज परिसर में आयोजित शोकसभा में हिंदी के विभागाध्यक्ष अनूप पटेल ने कहीं। उन्होंने कहा कि डॉ.नामवर सिंह ने अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। उनके निधन से साहित्य जगत को गहरा आघात लगा है। उनके निधन पर प्राचार्य डॉ.अयोध्यानाथ त्रिपाठी, डॉ. अरुण प्रताप सिंह, डॉ.सौम्या श्रीवास्तव, डॉ.वीणा त्रिपाठी, डॉ. ललिता पांडेय, स्नेहा वर्मा, निर्मला कुशवाहा ने शोक संवेदना व्यक्त की।
सेवरही प्रतिनिधि के अनुसार हिंदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह के निधन पर शिक्षकों ने शोक व्यक्त किया है। शिक्षकों ने इसे समाज और साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति करार दिया। इस दौरान शिक्षक नेता प्रहलाद प्रसाद केशरी, सुरेंद्र सिंह, मदन मोहन त्रिपाठी, गौरीशंकर राय, हिमांशु तिवारी, मधेश मिश्रा, प्रेम तिवारी, सीताराम कुशवाहा, सुनील वर्मा, नंदलाल त्रिपाठी आदि ने उनके निधन पर दो मिनट का मौन धारण कर शोक संवेदना व्यक्त किया।
आलोचना के शिखर पुरुष थे नामवर सिंह : गौरव
कसया। प्रख्यात साहित्यकार नामवर सिंह हिंदी ही नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय साहित्य में आलोचना के शिखर पुरुष थे। पिछले कुछ दिनों से वे बीमार चल रहे थे। उनका निधन हिंदी साहित्य के लिए बहुत बड़ी क्षति है।
ये बातें बुद्ध पीजी कॉलेज कुशीनगर में बुधवार को हिंदी के सहायक आचार्य डॉ गौरव तिवारी ने कहीं। उन्होंने कहा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ रामविलास शर्मा के बाद हिंदी आलोचना में निर्विवाद रूप से शिखर पुरुष थे। एक वक्ता के रूप में उनका कोई सानी नहीं था। वे एक लोकप्रिय अध्यापक और बहुपठित लेखक थे। पहले बीएचयू और फिर जेएनयू में विद्यार्थियों में उनकी इतनी ज्यादा लोकप्रियता थी कि कक्षाएं अन्य विषय के विद्यार्थियों से भरी रहती थी।