संतकबीरनगर। जननी की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार जिले में हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रही है लेकिन जहां वास्तव में सुरक्षा की जरूरत है, उसके लिए कोई इंतजाम नहीं है। स्थिति यह है कि जिले के किसी भी सरकारी अस्पताल में प्रसव पीड़िता की सर्जरी के लिए कोई महिला चिकित्सक ही नहीं है। आपात स्थिति में जिला अस्पताल में एक पुरूष सर्जन प्रसव पीड़िता की सर्जरी कर प्रसव करा देते हैं। अधिकांश मामलों में पीड़ितों को प्राइवेट अस्पतालों की ही शरण में जाना पड़ता है।
स्वास्थ्य विभाग पिछले पांच साल से जननी सुरक्षा योजना के तहत सुरक्षित प्रसव पर जोर दे रहा है। आशा कार्यकर्ता गांव-गांव प्रचार में लगी हैं। गर्भवती महिलाओं का डाटा जुटाया जा रहा है। उन्हें पोषण व टीकाकरण के लिए प्रेरित किया जा रहा है। मगर इसी गर्भवती के प्रसव के वक्त जब जान जोखिम में होती है तो विभाग हाथ जोड़ लेता है। वजह यह कि जिला अस्पताल में एक भी महिला सर्जन नहीं है। खलीलाबाद सीएचसी में अलग से महिला वार्ड है। जहां तीन डॉक्टरों की तैनाती है। एमबीबीएस डिग्रीधारी निधि गुप्ता और नूरी खान के अलावा आयुष चिकित्सक रेनू यादव सामान्य प्रसव तो करा देती हैं लेकिन स्थिति जटिल होने पर यह लोग मरीज को तुरंत जिला अस्पताल रेफर करती हैं। जबकि यहां तैनात महिला सर्जन डॉक्टर नीलम सिंह करीब छह माह से बस्ती जिले के किसी अस्पताल से अटैच हैं।
खलीलाबाद के अलावा मेेंहदावल, मलौली, सेमरियांवा, नाथनगर व सांथा सीएचसी में भी यही हालात हैं। अस्पताल में प्रसव के लिए आई गर्भवती महिला की हालत थोड़ी सी भी नाजुक होते ही डॉक्टर व अन्य स्टाफ तत्काल जिला अस्पताल जाने की सलाह देते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में कई बार साधन नहीं मिलने पर मरीज की जान को खतरा उत्पन्न हो जाता है।