बस्ती जिले से शुरू हुई संतकबीरनगर के तीन गांवों में चकबंदी की प्रक्रिया 24 साल बाद भी जारी है। इससे संबंधित काश्तकार को भारी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। वर्तमान में जिले के 25 गांवों में चकबंदी की प्रक्रिया चल रही है। नियम है कि चकबंदी की प्रक्रिया पांच साल में पूरी कर ली जाए।
1997 में बस्ती से अलग होकर संतकबीरनगर जिले का सृजन हुआ और तीन तहसीलें खलीलाबाद, मेंहदावल और धनघटा सृजित हुईं। 27 नवंबर 1992 में जिले के जंगलऊन गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरु हुई थी। जबकि 28 अप्रैल 1994 में राजेवोहा और मझारी खुर्द में चकबंदी शुरू हुई थी। नियमानुसार इन तीनों गांवों में पांच साल के भीतर चकबंदी की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए थी। जंगलऊन गांव में 1115 एकड़ जमीन और 5744 गाटा , राजेवोहा में 252 एकड़ जमीन ,183 गाटा और मंझारीखुर्द में 99 एकड़ जमीन और 90 गाटा है। प्रक्रिया में गति नहीं आने के पीछे जो वजह बताई जा रही है,उसके मुताबिक जनपद में नियमित रूप से लंबे समय से उप संचालक चकबंदी(एसओसी) का पद सृजित नहीं होना है।
वर्तमान में एडीएम के पास प्रभार है। 24 साल से तीन गांव चकबंदी की प्रक्रिया में अटके हुए है। यहां कब तक काम पूरा हो जाएगा,इसका सही जवाब अधिकारी नहीं दे पा रहे है। नौ जून को आए बंदोबस्त अधिकारी विक्रमादित्य वर्मा ने बताया कि जहां तक रहा सवाल तीन गांवों में लंबे समय से चकबंदी चलने का तो पत्रावली बस्ती जिले में पहले रही ,फिर वहां से यहां आने में देरी हुई। कर्मचारियों की पहले कमी की वजह से प्रक्रिया में तेजी नहीं आ पाई। राजेवोहा में 25 प्रतिशत नक्शा मिलान का काम हुआ है। अगले वित्तीय वर्ष में यहां चकबंदी की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। जंगलऊन और मझारीखुर्द में चकबंदी प्रक्रिया में तेजी लाए जाने की कोशिश शुरू कर दी गई और यहां भी वर्ष 2017 के अंत तक चकबंदी प्रक्रिया पूरी कर लिए जाने की पूरी उम्मीद है।