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नदी का जलस्तर घटकर 79.16 पर आ गया

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संतकबीरनगर। राप्ती और घाघरा घट कर खतरे के निशान से काफी नीचे भले ही पहुंच गई है ,लेकिन बाढ़ प्रभावित गांवों के लोगों की समस्याएं बरकरार है। प्रशासन की ओर से तैयार सूची के मुताबिक 103 गांव बाढ़ प्रभावित हैं। इन गांवों में कीटनाशक दवाओं के छिड़काव और सफाई कराए जाने का दावा हवा- हवाई साबित हो रहा है, जिसको लेकर प्रभावित गांवों के लोगों में संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ गया है।
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मेंहदावल प्रतिनिधि राप्ती नदी का जलस्तर बुधवार को 79 16 मीटर था,जो खतरे के निशान से 34 सेंटीमीटर नीचे है। यहां तटबंध सुरक्षित हैं। फिर भी अधिकारी कैंप की जगह बांध की निगरानी समय-समय पर कर रहे हैं। करमैनी-बेलौली तटबंध पर राप्ती के घटते जलस्तर से बांध से जलस्तर का दबाव पूरी तरह समाप्त हो गया हैं। ऐसे में तटबंध पर कही से पानी का दबाव देखने में नही आ रहा हैं। तटबंध व नदी के बीच जलस्तर का भारी गैंप बन गया हैं। दिक्कत घटते जलस्तर के बाद तटबंध से सटे गांव करमैनी, बेलौहा, भरथुआ, नौंगो, जोरवा, तिवारीपुर, छपिया पराग, बानडुमर, विशुनपुर, बढया, इंदरपुर, कुसौना, डुमरियाबाबू, थरौली, खैरा, बेलौली सहित अन्य गांव में दिक्कते बढ़ गई हैं । कहने को तो स्वास्थ्य विभाग ने यहां तटबंध पर मेडिकल कैंप लगा कर कोरम पूर्ति कर लिया लेकिन बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र में महामारी व मच्छरों के प्रकोप से बचाने का उपाय नहीं किया। हालात यह हैं कि बाढ़ ग्रस्त इस क्षेत्र में अब तक फागिंग न होने के कारण जहां मच्छरों का प्रकोप बढ गया है। वही प्रदूषित पानी पीने से कछारवासी परेशान हैं। क्षेत्रवासी मानवेन्द्र सिंह,इन्द्रसेन सिंह,शंम्भू यादव,संतोष सिंह,तारकेश्वर यादव,सुरेश यादव,दयासागर,जय प्रकाश यादव,ओम प्रकाश यादव,श्रीराम यादव आदि लोगो का कहना हैं कि जलस्तर घटने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस क्षेत्र मे फागिंग न कराने से मच्छरों का प्रकोप बढ गया हैं वही क्षेत्र मे स्थित नल व कुओं आदि में जल को शुद्व करने के लिए विभागीय स्तर पर कोई पहल नही किया गया। जिसका परिणाम हैं कि क्षेत्रवासी महामारी व प्रदूषित जल पीने को मजबूर हैं।
हैंसर प्रतिनिधि के अनुसार घाघरा नदी का जल स्तर तेजी के साथ घटने लगा है। नदी घट कर 78 85 मीटर पर पहुंच गई जो खतने के निशान से आधा मीटर नीचे है। नदी का पानी घटने से लोग अपने- अपने घरों को पहुंचने लगे है, लेकिन बाढ़ से हुए नुकसान और सामने आई तरह तरह की समस्याओं की भरपाई होने वाली नही है। प्रशासन ने 11 दिन बाद जो आपदा राहत के नाम पीडितों को राहत साम्रगी दिया, वह ऊंट के मुहं में जीरा के समान साबित रहा और अब घर पहुंचने के बाद उनके सामने खाने से लेकर रहने तक की परेशानी मुंह बाए खडी है।
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घाघरा की बाढ से धनघटा तहसील के 22 गांव के 1000 परिवार घर छोडकर बंधे पर आने को विवश हो गए थे। लगातार 11 दिनो तक बगैर किसी प्रशासनिक मदद के बाढ़ पीडित किस तरह समय गुजारे यह तो वही जानते होगें। 11 दिन बाद जब प्रशासन राहत सामग्री बांटने चला तो वह भी आधा अधूरा बितरित हुआ। जिससे पीडित राहत नही आहत हुए। गायघाट गांव के रामनयन, दयाराम, चंद्रभान, संजय, रामू, आदि का कहना है कि आधे लोगो को राहत सामग्री मिली तो आधा लोगो को छोड दिया गया। अब जब लोग अपने घरो को पहुंच गए तो गांव में दूषित जल, मच्छर के प्रकोप के कारण संक्रामक बीमारिया चपेट में लेने लगी है। गुनवतिया गांव के रामजी, परशुराम, दयानाथ, सुन्दर, फागू आदि ने कहा कि गांव में जाने वाला रास्ता बाढ में कट गया। जिस स्थान पर कटा हुआ है, वहां कमर भर पानी है। प्रशासन ने नाव भी हटा लिया। जिससे पानी में घुस कर आना जाना पड रहा है। ड्रेनेज खंयड के एक्सईएन आर एन सिंह यादव ने बताया कि राप्ती खतरे के निशान से 34 सेंटीमीटर तो घाघरा 550 सेंटीमीटर नीचे बह रही है। बांध को कोई खतरा नहीं रह गया है। वैसे बांधों की निगरानी कराई जा रही है।
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