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बच्चे को मदद का इंतजार

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आश्वासन ‘तमाम’ पर ‘मदद’ को नहीं बढ़े हाथ
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पहले पिता ने छोड़ी दुनिया, बाद में मां भी चल बसी
फोटो
अमर उजाला ब्यूरो
हैंसर। अनाथ हुए तीन मासूमों का ‘दर्द’ कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है। इसे दूर करने के लिए ‘दवा’ के नाम पर आश्वासन के ‘तमाम खुराक’ दिए गए, लेकिन समय के साथ मददगार भी ओझल होते गए। भला कहो उस पड़ोसी बुजुर्ग का जिसका हाथ इन मासूमों के सिर पर है। अन्यथा अनाथ बच्चे दाने-दाने को मोहताज हो जाते। जब इन पर दुखों का पहाड़ टूटा था, तब जनप्रतिनिधि से लेकर अधिकारी तक इनकी देखरेख के दावे किए थे। दिल्ली की एक संस्था के अलावा संतकबीर बाल आश्रम के लोग भी मासूमों को गोद लेने की बात कही थी।
ये दर्द भरी कहानी दुघरा कला गांव के नौ वर्षीय संदीप, सात वर्षीय मंदीप और पांच वर्षीय मनीष की है। तीनों के सिर से एक साल के अंदर माता-पिता का साया उठ गया। 36 वर्षीय पिता विंध्याचल मेहनत-मजदूरी कर घर का खर्च चलाते थे। करीब दस माह पहले विंध्याचल सुबह के वक्त मूड़ाडीहा मजदूरी करने निकाला। अचानक ट्रक की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई। 32 वर्षीय पत्नी रंजू देवी पति की मौत को सहन न कर सकी। वह सदमे में चली गई। यहीं से उसकी गृहस्थी लड़खड़ा गई। नात-रिश्तेदारों की दिलासा के बावजूद रंजू सदमे से उबर नहीं पाई। ऐसे में उसके घर का खर्च दूसरों की रहमो-करम पर निर्भर हो गया। करीब एक माह पहले रंजू ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। माली हालत इतनी अधिक खराब थी कि चंदे की रकम से अंतिम संस्कार हुआ। ब्रह्मभोज का खर्च विधायक श्रीराम चौहान ने उठाया। माता-पिता का साया सिर से उठने के बाद तीनों मासूम अनाथ हो गए। इस खबर को ‘अमर उजाला’ ने प्रमुखता से छापा। इसके बाद जनप्रतिनिधियों से लेकर आला अफसरों की नींद टूटी। विधायक, एसडीएम व प्रोवेशन अधिकारी समेत संतकबीर बाल आश्रम के प्रबंधक समेत तमाम लोग वहां पहुंचे। अनाथ मासूमों की अच्छी परवरिश के दावे किए गए, मगर समय के साथ ये ‘दावे’ ठंडे बस्ते में जाते दिख रहे हैं।
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80 वर्षीय बुजुर्ग की देखरेख में रह रहे मासूम
ब्रह्मभोज से पहले अनाथ मासूमों की देखरेख को लालायित संस्था और लोग जब दूरी बनाते दिखे तो पड़ोसी 80 वर्षीय मुनेश्वर ने बच्चों की देखभाल का बीड़ा उठाया। यह बात दीगर है कि मुनेश्वर खुद चलने-फिरने में असमर्थ हैं, लेकिन रिश्ते में मासूमों का ‘बाबा’ होने के नाते उन्हें इनका दर्द नहीं देखा गया। तीनों अब इन्हीं के पास रहते हैं। खाने-पीने की व्यवस्था भी मुनेश्वर करते हैं। आर्थिक तंगी की वजह से नौ वर्षीय संदीप ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। बताया जा रहा है कि मासूमों के ननिहाल के लोग लुधियाना रहते हैं। जब रंजू की मौत हुई थी तो बच्चों की मौसी आई थीं, लेकिन उन्होंने भी बच्चों को साथ ले जाना मुनासिब नहीं समझा।









संवाददाता की ओर से भेजी गई खबर
संतकबीरनगर। पहले पिता और बाद में माता की मौत से अनाथ हुए दुघरा कला गांव के तीन भाईयों को अब तक सरकारी और स्वयं सेवी संस्थाओं की मदद नहीं मिली। विधायक की मदद से माता का अंतिम संस्कार तो हो गया लेकिन अब इन बच्चों के सामने रोटी व दवाई का संकट आने लगा है। जीवन भर मदद का आश्वासन देने वाले अभी तक दुबारा उन बच्चों के घर नहीं पहुंचे।
दुघरा कला निवासी नौ वर्षीय संदीप, सात वर्षीय मंदीप और पांच वर्षीय मनीष के साथ कुदरत ने 10 माह पहले क्रूर मजाक किया था। पिता विन्ध्याचल की मूड़ाडीहा केे पास सड़क हादसे में मौत हो गई। पति की अचानक मौत से सदमे में आई पत्नी रंजू (अनाथ बच्चों की मां) बीमार हो गई। बीते 21 नवबंर को रंजू भी तीनों बेटों को छोड़कर दुनिया से चल बसी। अनाथ हुए बच्चों के पास मां के अंतिम संस्कार तक का इंतजाम नहीं था।
अमर उजाला ने खबर प्रकाशित कर बच्चों की पीड़ा को समाज व प्रशासन के जिम्मेदारों तक पहुंचाई तो एसडीएम, विधायक व प्रोवेशन अधिकारी समेत संतकबीर बाल आश्रम के प्रबंधक समेत तमाम लोग वहां पहुंचे। विधायक श्रीराम चौहान ने रंजू देवी के ब्रह्मभोज का इंतजाम कराया। बाल कल्याण समिति के निर्देश पर प्रोवेशन विभाग ने बच्चों के हालात की जांच कराकर उन्हें बाल आश्रम को सौंपने की प्रक्रिया शुरू की। लेकिन कुछ ही दिन में सब लोग बच्चों को भूल गए। तीनों बच्चे अगल बगल के घरों के लोगों की कृपा पर वक्त काट रहे हैं।
गांव के निवासी व जिला पंचायत सदस्य संतोष चौहान का कहना है कि बच्चों की परवरिश के लिए उस वक्त दिल्ली की एक संस्था के अलावा संतकबीर बाल आश्रम के लोग भी आए थे। बच्चों को संतकबीर बाल आश्रम में ही भेजने की बात हुई थी लेकिन अभी कोई आया नहीं।
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ग्राम प्रधान प्रतिनिधि फूलचंद्र चौहान का कहना है कि अभी तक बच्चों को कोई सरकारी मदद नहीं मिली है परंतु वे लोग बच्चों की देखभाल कर रहे हैं। इस संबंध में एसडीएम धनघटा बाबूराम ने कहा कि इधर कई सरकारी कार्यक्रमों में व्यस्तता व गांव के लोगों द्वारा ब्रह्मभोज के बाद ही बच्चों को कहीं भेजने के अनुरोध को देखते हुए देरी हुई। बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए नियमानुसार कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है।
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