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Sambhal News: होलाष्टक शुरू, मांगलिक कार्यों पर लगी रोक

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चंदौसीद्ध(संभल)। फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से फाल्गुन माह की पूर्णिमा तक होलाष्टक का समय माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। होलाष्टक यानी होली से पहले के वो आठ दिन, जिस समय सभी शुभ एवं मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। होलाष्टक का लगना होली के आने की सूचना है।
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इन आठ दिनों के दौरान पर सभी विवाह, गृहप्रवेश या नई दुकान खोलना जैसे शुभ कार्यों को नहीं किया जाता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही होलाष्टक की समाप्ति होती है।


मंगलवार सुबह 7:01 बजे से होलाष्टक शुरू हो गए हैं। ऐसे में आज से कुछ मुख्य कार्यों का प्रारंभ होता है। वहीं कुछ कार्य ऐसे भी काम हैं जो इन आठ दिनों में बिलकुल भी नहीं किए जाते हैं। होलाष्टक के दिन से लेकर होलिका दहन के दिन तक रहती है। ज्योतिषाचार्य पं. भूदेव शंखधार बताते हैं कि होलाष्टक के समय हिंदुओं में बताए गए शुभ कार्यों एवं सोलह संस्कारों में से किसी भी संस्कार को न किए जाने का विधान रहा है।
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मान्यता है कि इस दिन अगर अंतिम संस्कार भी करना हो तो उसके लिए पहले शांति कार्य किया जाता है। उसके उपरांत ही बाकी के काम होते हैं। संस्कारों पर रोक होने का कारण इस अवधि को शुभ नहीं माना गया है।





होलाष्टक में नहीं होगा कोई अनुष्ठान व संस्कार



चंदौसी। इस समय पर कुछ शुभ मांगलिक कार्य जैसे कि विवाह, सगाई, गर्भाधान संस्कार, शिक्षा आरंभ संस्कार, कान छेदना, नामकरण, गृह निर्माण करना या नए अथवा पुराने घर में प्रवेश करने का विचार इस समय पर नहीं करना चाहिए। ज्योतिष अनुसार, इन आठ दिनों में शुभ मुहूर्त का अभाव होता है। पंडित भूदेव शंखधार के अनुसार होलाष्टक की अवधि को साधना के कार्य अथवा भक्ति के लिए उपयुक्त माना गया है। इस समय पर केवल तप करना ही अच्छा कहा जाता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए किया गया धर्म-कर्म शुभदायी होता है। इस समय पर दान और स्नान की भी परंपरा है।


होलाष्टक पर क्यों नहीं किए जाते शुभ मांगलिक काम



चंदौसी। ज्योतिषविद बताते हैं कि होलाष्टक पर शुभ और मांगलिक कार्यों को रोक लगा दी जाती है। इस समय पर मुहूर्त विशेष का काम रुक जाता है। इन आठ दिनों को शुभ नहीं माना जाता है। इस समय पर शुभता की कमी होने के कारण ही मांगलिक आयोजनों को रोक दिया जाता है। आठवें दिन यानी की फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका को जिम्मा सौंपा। होलिका को वरदान प्राप्त था की वह अग्नि में नहीं जल सकती। होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाती है। मगर भगवान विष्णु ने अपने भक्त को बचा लिया। उस आग में होलिका जलकर मर गई लेकिन प्रह्लाद को अग्नि छू भी नहीं पाई। इस कारण से होलिका दहन से पहले के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता हैं और शुभ समय नहीं माना जाता।
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