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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमपाल रस्तोगी अंग्रेजों का झंडा उतारे के लिए याद किए जाएंगे

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प्रेमपाल रस्तोगी, मृतक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का फाइल फोटो। - फोटो : SAMBHAL
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संभल। 18 जुलाई 1921 को संभल के सिरसी में जन्में प्रेमपाल रस्तोगी स्वतंत्रता संग्राम में भागीदार रहे थे। गांधीवादी विचार धारा से स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में जुटे और जिंदा रहने तक वही विचार धारा बनी रही। पूरे जिले में 221 लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया।
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प्रेमपाल रस्तोगी आजादी की कहानी बयान करने के लिए अब तक जिंदा थे। बुधवार को रात उन्होंने अंतिम सांस ली। प्रेमपाल रस्तोगी जमींदार घराने से ताल्लुक रखते थे। उस जमाने में स्नातक किया था। आजादी की लड़ाई में भागीदारी करने के लिए उतावले रहते थे। 1938 में संभल के हिंद इंटर कालेज के पास यूनियन जैक (ब्रिटिश सरकार का झंडा) प्रेमपाल रस्तोगी ने अपने साथी प्रहलाद कुमार, मौलाना कय्यूम, चेतन स्वरूप के साथ मिलकर उतार दिया था। जिसके बाद उन्हें डेढ़ वर्ष जेल में रहना पड़ा। संभल के एजेंटी चौराहे से प्रेमपाल रस्तोगी और उनके साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। बताते हैं कि जब यूनियन जैक उतारने के आरोप में उनको और उनके साथियों को गिरफ्तार किया गया तब कोतवाली संभल के बाहर जहां अब बाजार हुआ करता है। वहां पांच हजार से ज्यादा लोग एकत्र हो गए थे।
सभी लोग प्रेमपाल रस्तोगी और उनके साथियों को छोड़ने की मांग उठा रहे थे लेकिन मामला यूनियन जैक उतारने का था इसलिए छोड़ा नहीं गया। जेल से आने के बाद गांधी विचार धारा के साथ लड़ाई जारी रखने का संकल्प लिया। और आगे बढ़ते गए। इस दरमियान जवाहर लाल नेहरू संभल आए और उन्होंने प्रेमपाल रस्तोगी और उनके साथियों से मुलाकात की थी।
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बुधवार को दिन में अमर उजाला से बात करते हुए उन्होंने बताया था कि संभल में अंग्रेजों ने सेना भर्ती के लिए शिविर लगाया था। उसी दौरान महात्मा गांधी की चिट्ठी आ गई। इस चिट्ठी में लिखा था कि शिविर लग नहीं पाए और कोई भागीदारी भी नहीं कर सके।
इस संदेश के मिलने के बाद प्रेम पाल रस्तोगी व उनके साथियों ने विरोध किया। इसी के चलते अंग्रेजों ने पांच मई-1941 को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया था। काफी समय जेल में रहे थे। 15 अगस्त 1947 की पहली सुबह को याद करते हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने बताया था कि वह सुबह किसी पर्व से कम नहीं थी। बुधवार की रात को उनकी मौत होने की सूचना शहर में हुई तो गम की लहर दौड़ गई।
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