जिले में अब अल्ट्रासाउंड के नाम पर फर्जीवाड़ा सामने आया है। पीड़ितों ने सीएमओ को बताया कि, जिले में एक ही डॉक्टर के रजिस्ट्रेशन पर कई जगह दुकानें चलाई जा रही हैं और यहां अप्रशिक्षित स्टाफ जांच कर रहा है। बाद में मरीजों को बिना चिकित्सक के साइन के ही रिपोर्ट पकड़ा दी जा रही है।
बताया कि, संभल, बबराला, बहजोई, असमोली, चंदौसी में हर जगह ऐसी दुकानें देखी जा सकती है, जहां डाक्टरों के नाम पर अप्रशिक्षित स्टाफ अल्ट्रासाउंड करता नजर आ जाएगा। यहां वे डाक्टर मिलते ही नहीं, जिनके नाम पर अल्ट्रासाउंड चलते हैं।
आम तौर पर टेक्नीशियन ही अल्ट्रासाउंड करते हैं जबकि इसके लिए एमडी रेडियोलाजी या डिप्लोमा रेडियोलाजी होना चाहिए। सीएमओ डा. राजवीर सिंह ने बताया कि उनके पास संभल से अल्ट्रासाउंड मशीन के फर्जीवाड़े की शिकायत फोन पर आई है। इस मामले में डा. प्रभाकर बंधु को जांच सौंप दी गई है।
अल्ट्रासाउंड के नाम पर हो रहा है फर्जीवाड़ा
सरायतरीन निवासी शशिबाला ने कहा कि अल्ट्रासाउंड के नाम पर मरीजों के संग बड़ा फर्जीवाड़ा हो रहा है। वह संभल के एक अल्ट्रासाउंड सेंटर पर क्वालीफाइड डाक्टर का बोर्ड देखकर गईं। बोर्ड के हिसाब से मुरादाबाद के डाक्टर सेंटर पर आकर अल्ट्रासाउंड करते हैं लेकिन जब अल्ट्रासाउंड का नंबर आया तो एक स्थानीय डाक्टर ने अल्ट्रासाउंड किया। इसके बाद रिपोर्ट बिना किसी डॉक्टर के हस्ताक्षर के पकड़ा दी। इस मामले में सीएमओ से शिकायत की गई है। जांच की मांग की गई है।
हकीकत से हटकर कर दी रिपोर्ट, पीड़ित गया फोरम
सौंधन निवासी धर्मेश यादव की पत्नी बाला यादव ने बहजोई के एक अल्ट्रासाउंड सेेंटर में अल्ट्रासाउंड कराया। बाला यादव के पेट में बच्चा स्वस्थ था लेकिन अल्ट्रासाउंड सेंटर की रिपोर्ट में यह दर्शाया गया कि बच्चा खतरे में हैं।
बाला यादव ने कहा कि उन्हें रिपोर्ट पर शक हुआ। इसलिए उन्होंने संभल के दूसरे पैथोलॉजी सेंटर में अल्ट्रासाउंड कराया। बच्चा स्वस्थ होने की रिपोर्ट आई। इस मामले में अब वह उपभोक्ता फोरम में केस कर चुकी हैं।
ये है पूरा खेल
संभल। एक डाक्टर के नाम से कई कई अल्ट्रासाउंड सेंटर चल रहे हैं। अब आप ही बताइए कि एक डाक्टर एक समय में कितनी जगह अल्ट्रासाउंड कर सकता है। कमाल की बात तो यह है कि कुछ केंद्रों पर तो डाक्टर कभी कभार तब ही आते हैं जब कोई चेकिंग होनी होती है।
चेकिंग के नाम पर सिर्फ खानापूरी होती है। आरोप है कि, चेकिंग से पहले ही अवैध तरीके से संचालित अल्ट्रासाउंड केंद्रों तक सूचना पहुंच जाती है। इसमें सरकारी कर्मचारियों का ही हाथ होता है। चेकिंग के वक्त कुछ देर के लिए डाक्टर साहब आ जाते हैं और मरीज की जान से खिलवाड़ का खेल चलता रहता है।