संभल को समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है, सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव व उनके भाई प्रो.रामगोपाल यादव भी यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वर्तमान में यहां के विधायक इकबाल महमूद प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री है तो कद्दावर नेता पूर्व सांसद डा.शफीकुर्रहमान बर्क भी यहीं के हैं।
ऐसे में ब्लाक प्रमुख पद के लिए पार्टी ने सपा जिलाध्यक्ष फिरोज खां के भाई को ब्लाक प्रमुख पद का प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा। जाहिर है कि सपा के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न था लेकिन इसके बावजूद भाजपा नेता व पूर्व ब्लाक प्रमुख चौधरी नरेंद्र सिंह की पत्नी कुसुम देवी ने सपा प्रत्याशी को 67.59 फीसदी मत लेकर करारी शिकस्त दे दी।
सपा जिलाध्यक्ष फिरोज खां पहले तो एमएलसी के लिए टिकट के दावेदार थे, लेकिन उन्हें एमएलसी की टिकट तो नहीं मिला लेकिन पार्टी हाईकमान ने उनके भाई आरिफ खां को ब्लाक प्रमुख के लिए प्रत्याशी बनाकर उन्हें साधा। सपा जिलाध्यक्ष की नजरें संभल की ब्लाक प्रमुखी पर टिकी थी।
उन्होंने अपनी पत्नी व भाई दोनों को ही बीडीसी सदस्य का चुनाव लड़ाया था, जिसमें उनकी पत्नी तो हार गई लेकिन भाई आरिफ चुनाव जीत गए थे। सपाइयों ने हर संभव प्रयास किया कि आरिफ खां चुनाव जीतें लेकिन संभल ब्लाक प्रमुखी पर खानदानी कब्जे वाले वाले परिवार के चौधरी नरेंद्र सिंह के सियासी रसूख और स्वच्छ छवि के चलते प्रयास विफल हो गए।
संभल की ब्लाक प्रमुखी पर चौधरी नरेंद्र सिंह की पत्नी कुसुम देवी का कब्जा बरकरार रहा। इसी के साथ ही सपा जिलाध्यक्ष फिरोज खां की भाई को ब्लाक प्रमुख बनाने की हसरत अधूरी रह गई। हालांकि पूर्व सांसद डा.शफीकुर्रहमान बर्क ने चुनाव परिणाम आते ही हार की ठीकरा कैबिनेट मंत्री इकबाल महमूद के सिर फोड़ने में देर नहीं लगाई। उन्होंने कहा कि इकबाल महमूद ने भितरघात करके भाजपा प्रत्याशी की मदद की है।
पूर्व सांसद डा.शफीकुर्रहमान बर्क का कहना है ब्लाक प्रमुख चुनाव में कैबिनेट मंत्री इकबाल महमूद के कारण ही हार हुई है, उन्होंने भितरघात किया है। चाहे लोक सभा चुनाव, नगर पालिका का हो या फिर ब्लाक प्रमुखी का चुनाव हो, उन्होंने पार्टी को ही नुकसान पहुंचाया है। जब घर में ही नकब लग रहा हो तो पार्टी यहां कैसे जिंदा रहेगी लेकिन यह अधिक दिनों तक चलने वाला नहीं है।
कैबिनेट मंत्री इकबाल महमूद ने कहा कि इसमें दो राय नहीं कि संभल सपा का गढ़ है, लेकिन यह चुनाव सिंगल वोट मैनेजमेंट का होता है, प्रत्याशी समन्वयक व प्रबंधन नहीं बना सका। जो आरोप लगा रहे हैं, वही बता दें कि उन्होंने कौन सा वोट प्रत्याशी को दिलाया। उम्र 90 साल हो गई है, शरीर कमजोर हो गया है, राजनीति भागदौड़ से होती है। इसलिए घर बैठे किसी पर इल्जाम लगाते रहते है। पिछले चुनाव में बसपा सरकार थी, वह बसपा से सांसद थे, तो फिर यहीं कुसुम देवी चुनाव कैसे जीत गई थीं।