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हर बुरे काम से बचाता है रोजा

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चंदौसी। ना जुबां किसी को बुरा कहे, ना आंखें किसी पर बुरी नजर डालेें, ना दिमाग में कोई बुराई उपजेे, ना कान किसी की बुराई सुनें और ना ही कदम बुराई के रास्ते पर आगे बढ़े। हाथों से कोई ऐसा काम ना हो, जिससे किसी का दिल दुखे। यही है रोजे के असल मायने और सच्चे रोजेदार को करने भी चाहिए।
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सुबह सहरी कर शाम को इफ्तार, पूरे दिन भूखे प्यासे रहने भर का ही नाम रोजा रखना नहीं है, बल्कि नफ्शे अंमारा यानी बुरी आदतों से तौबा करने को रोजा कहते हैं। इतना ही नहीं रोजा कई बीमारियों से बचाकर शारीरिक सफाई भी करता है। शहर काजी हाजी मरगूब नौशाही और संभल के मौलाना मोहम्मद रैयान का भी यही मानना है। उनका कथन है कि अल्लाह की रजा में राजी रहना ही रोजा है। जिसमें बुराई और नफरत के लिए कोई जगह न हो।
रोजेदार अल्लाह की इबादत करते हुए अल्लाह की नेक राह पर चलें। नफ्श यानी ख्वाहिश, अंमारा का मतलब बुरी आदतों से है। सिर्फ सुबह सहरी करके दिन भर भूखे प्यासे रहकर शाम को इफ्तार करने का ही नाम रोजा नहीं। सभी मुसलमानों को पाबंदी के साथ रोजा रखना चाहिए। इसके साथ ही रोजा रखने में दिन भर रोजेदार कुछ खाता पीता नहीं है। इसलिए शारीरिक मशीनरी को आराम मिल जाता है, वह साफ और बेहतर हो जाती है।
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इससे ब्लड प्रेशर, खून का गाढ़ापन, मधुमेह, लीवर आदि की खराबी जैसी बीमारियां खुद व खुद ठीक हो जाती है। शरीर का भार कम हो जाता है। नमाज अदा करने से शारीरिक कसरत भी हो जाती है। जिसका लाभ भी शरीर को मिलता है। जो लोग रोजा रखकर बुराइयों में लिप्त रहते हैं, उन्हें मुकद्दस माह-ए- रमजान में भी रोजे का वह फल नहीं मिल पाता जो मिलना चाहिए।
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