सहारनपुर। मशरूम की खेती से कई महिलाओं को न सिर्फ स्वरोजगार मिल रहा है बल्कि वे आत्मनिर्भर भी बन रही हैं। यह महिलाएं घर के काम के साथ ही मशरूम उत्पादन से अच्छी आय प्राप्त कर रही हैं।
जनपद में पूरे वर्ष मशरूम की खेती होती है। इसके चलते युवाओं से लेकर महिलाओं तक का रुझान इस खेती की ओर हुआ है। जनपद में करीब एक दर्जन महिलाएं मशरूम उत्पादन से जुड़ी हैं। मिल्की मशरूम का उत्पादन जून से सितंबर तक होता है। बटन मशरूम की खेती अक्तूबर से लेकर मार्च तक होती है। आयस्टर या ढिंगरी मशरूम का उत्पादन फरवरी से शुरू होकर मई तक होता है। इसकी खेती पूरे वर्ष आसानी से होती है। जनपद में अधिकांशतया बटन मशरूम की खेती को पसंद किया जा रहा है। हालांकि अब आयस्टर की खेती के प्रति भी रुझान बढ़ा है।
अचार, मुरब्बा और पाउडर भी बना रहीं
महिलाएं मशरूम को बाजार में बेचने के साथ ही उसका प्रसंस्करण कर अन्य उत्पाद भी तैयार कर रही हैं। वे इसका अचार, मुरब्बा, पापड़ और सुखाकर पाउडर बनाकर भी बेच रही हैं। इसके अलावा स्थानीय खपत के साथ ही यहां से देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ तक मशरूम की सप्लाई की जा रही है।
बोलीं, मशरूम उत्पादक महिलाएं
ग्राम आजमपुर की मीनाक्षी ने बताया कि वे पिछले दो वर्ष से घर की छत पर मशरूम की खेती कर रही हैं। अभी बटन मशरूम के 300 बैग लगे हैं। इससे अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।
ग्राम मुर्तजापुर की पूजा का कहना है कि कम लागत में शुरू होने वाली मशरूम की खेती से अच्छा मुनाफा हो रहा है। 270 बैग में मशरूम लगाकर प्रतिमाह औसतन 25 से 30 हजार रुपये की आय हो रही है।
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ग्राम आजमपुर की कल्पना सैनी ने बताया कि वे पिछले चार वर्षों से मशरूम की खेती अपने घेर में कर रही है। इससे मिलने वाली आय से आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है।
बिहारीगढ़ में मशरूम की खेती करने वाली प्रियंका सिंह बड़े स्तर पर मशरूम की खेती कर रहीं हैं। उनका कहना है कि इसमें महिलाओं को स्वरोजगार मिलने के साथ ही आमदनी प्राप्त हो रही है।
वर्जन
जनपद में युवाओं के साथ ही कई महिलाएं भी मशरूम की खेती कर बढि़या मुनाफा कमा रही हैं। इससे उन्हें न सिर्फ स्वरोजगार मिल रहा है, बल्कि आमदनी भी हो रही है। इससे महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है। डॉ. आईके कुशवाहा, प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र।