सहारनपुर शहर में दो सौ से अधिक जर्जर भवन हैं, जिनमें सैकड़ों परिवारों के हजारों सदस्य रह रहे हैं। पिछले वर्ष बारिश में ऐसे ही दो भवनों के हिस्से गिरने से कई लोगों की मौत हो गई थी।
इस बार भी पहली बारिश में ही एक मकान की छत गिरने से तीन की मौत हो गई। ऐसे में सवाल यह है कि यदि अन्य जर्जर भवनों के साथ ऐसा हादसा होता है तो कौन जिम्मेदार होगा ?
शुक्रवार की रात सीजन की पहली ही बारिश में मानकमऊ में मकान की छत गिरने से तीन बच्चों की मौत हो गई। पुराने शहर पर नजर दौड़ाई जाए तो सैकड़ों की संख्या में प्राचीन और जर्जर भवन मिल जाएंगे, जो दो और तीन मंजिला हैं।
ऐसे भवन उनमें रहने वालों के साथ ही पड़ोसियों के लिए भी खतरा बने हुए हैं। पिछले वर्ष छत्ता जंबूदास में एक जर्जर इमारत की शिकायत लेकर कुछ लोग पहुंचे थे।
उनका कहना था कि जर्जर भवन की वजह से उनके मकानों को खतरा है। उन्होंने मकान को ध्वस्त कराने की मांग नगर निगम से की थी। हैरत की बात यह है कि इन जर्जर भवनों में कई-कई परिवार रह रहे हैं।
तीन साल पहले नगर निगम की टीम ने शहर के जर्जर भवनों केे चिह्नित किया था, जिसका मकसद जर्जर भवनों को ध्वस्त कराना था, जिससे कोई हादसे में जान या माल का नुकसान न हो सके। मगर निगम की कार्रवाई केवल भवनों के चिह्नित करने ही तक ही सीमित रही।
उधर, निगम ने जर्जर भवनों को खाली कराकर ध्वस्त कराने की सोची थी। मगर जब भवनों में रहने वाले लोगों से संपर्क किया गया तो पता चला कि ज्यादातर भवनों का मामला कोर्ट में चल रहा है।
दरअसल, एक-एक भवन में वर्षों से कई-कई परिवार रह रहे हैं। चूंकि भवन शहर के बीच में हैं, इसलिए उनके दाम काफी महंगे हैं। इसी के चलते भवनों पर स्वामित्व को लेकर लोगों में विवाद है और मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। यही वजह है कि कोई भी व्यक्ति भवन के जर्जर होने के बावजूद उन्हें खाली करने को तैयार नहीं है।