बताया गया कि गांव में सौर ऊर्जा की प्लेट लगाकर बिजली आपूर्ति की व्यवस्था की गई थी, लेकिन एक बार बैटरियां खराब होने के बाद किसी ने इन्हें नहीं बदलवाया। पीने के पानी के लिए ग्रामीण वर्ष 1985 में बने शिवालिक जल श्रोत के कुएं पर निर्भर है। अपनी और मवेशियों की प्यास इसी से पानी लाकर बुझाते हैं। बरसात में इसकी भी पाइप लाइन बहने पर जलापूर्ति ठप हो जाती है। भीषण गर्मी में जल स्रोत का पानी सूखने के बाद दूर-दराज से खोल (नदी) का गंदा पानी लाकर दैनिक कार्यों की पूर्ति की जाती है।
कुएं से पानी लाती गांव की महिलाएं।
- फोटो : अमर उजाला
राजस्व ग्राम का दर्जा मिलने पर कराए जा रहे विकास कार्य
ग्राम प्रधान रानी देवी ने बताया कि शिवालिक जंगल में जब इस गांव को बसाया गया था, तब वन विभाग ने प्रति परिवार छह बीघा जमीन आवंटित की थी। इसमें ही आवास की जमीन भी थी। अनुसूचित बाहुल्य इस गांव को जंगलों को विकसित करने के लिए गांव अब्दुल्लापुर से लाकर बसाया गया था। अब 600 की आबादी वाले इस गांव में 50 परिवार निवास करते हैं। यहां बसे ग्रामीणों की आय का स्रोत वन विभाग के पौधरोपण अभियान में मजदूरी, पहाड़ियों पर उगने वाली भाभड़ घास काट कर बान बनाने व जंगल से जलावनी लकड़ी बीनकर बेचना है। पहले वन विभाग की जमीन होने की वजह से यहां विकास कार्य संभव नहीं थे लेकिन, अब राजस्व ग्राम का दर्जा मिलने पर विकास कार्य कराए जा रहे हैं।
छप्पर में रहता है परिवार।
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- 70 वर्षीय फूल देवी का कहना है पहले बैलगाड़ी में पीने का पानी कई किमी से लाते थे। पूरा जीवन फूंस की झोपड़ी में बीत गया। गरीब की कोई सुनने वाला नहीं है।
इसी कुएं से पानी लाते हैं ग्रामीण।
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- 93 वर्षीय प्रकाश चंद का कहना है कि पूरी जिंदगी सुविधाओं के अभाव में बिता दी। यहां से पहले सहंश्रा खोल में रहे। उसके बाद यहां आए और अपने पूर्वजों के साथ पौधारोपण किया। अब कुछ उम्मीद जगी है।
- 80 वर्षीय प्रकाशी का कहना है कि उनके गांव के बच्चों को कम से कम अब सिर छुपाने के लिए पक्की छत तो मिली जो शेष रह गए हैं उनको भी जल्द मकान मिलने की उम्मीद जगी है।
- गांव के 78 साल के मुल्तान सिंह का कहना है कि उन्होंने आज तक जलता हुआ बल्ब नहीं देखा। रात में जंगल के सन्नाटे के बीच लकड़ियों को जलाकर उनकी रोशनी में खाना बनाते हुए 50 साल बीत गए।
- वनाधिकार कानून समिति के ग्राम अध्यक्ष शेर सिंह कहते हैं कि सुविधाओं की आस में उनकी उम्र बीत गई है। राजस्व गांव का दर्जा मिलने के बाद भी कोई खास विकास नहीं हो पाया है।