सहारनपुर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान के साथ देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए जो अंतिम लड़ाई लड़ी गई, उसे नाम दिया गया था अगस्त क्रांति। इसकी शुरूआत हुई थी नौ अगस्त 1942 को। यह दिवस हमें याद दिलाता है उन अमर शहीदों के बलिदान की, जिन्होंने अपने प्राणों को न्यौछावर कर देश को आजादी दिलवाई और आज हम आजाद देश में चैन की सांस ले पा रहे हैं। ऐसे ही बलिदानियों में असंख्य ऐसे क्रांतिकारी भी शामिल रहे, जो अब तक गुमनाम हैं लेकिन ब्रिटिश हुकू मत द्वारा उनके साथ किए गए जुल्मों की गवाही आज भी कुछ स्थल देते हैं।
इन्हीं में शामिल है शहर के लोहा बाजार में स्थित वर्ष 1857 के अमर शहीदों का वह स्मारक, जो आज भी असंख्य क्रांतिकारियों के बलिदान का गवाह है। इस लोहे बाजार का नाम पहले शहर के ही स्वतंत्रता सेनानी रहे ललिता प्रसाद अख्तर के नाम से ललिता प्रसाद अख्तर बाजार भी रहा। शहीद स्मारक समिति से जुड़े डॉ. वीरेंद्र आजम और पंडित जयनाथ शर्मा बताते हैं कि ब्रिटिश शासन में आजादी के आंदोलन में शामिल असंख्य लोगों को सरेआम सामूहिक फांसियां भी दी गई हैं। ऐसा ही यहां पीपल के पेड़ पर हुआ था। अंग्रेजी हुकू मत के खिलाफ आवाज उठाने वाले असंख्य लोगों को इसी पेड़ पर सामूहिक फांसी दी गई। इसी स्मारक स्थल पर हर वर्ष नौ अगस्त क्रांति दिवस और 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर अमर शहीदों को नमन किया जाता है।
बताते हैं कि इन शहीदों को कई दिन तक पेड़ पर लटकाया जाता था। इसके पीछे मंशा यही थी कि इन्हें देखकर लोगों में और भय बढ़े और डरें। शहीद स्मारक की देखरेख में मुख्य भागीदार पंडित वासुदेव निर्मोही बताते हैं कि इन क्रांतिकारियों का बलिदान तो और भी महत्वपूर्ण था क्योंकि वे आज भी गुमनाम हैं जबकि आजादी की जंग में उनकी प्रमुख भूमिका रही। लोहे बाजार के अलावा चौकी सराय और शहीद गंज में भी कुछ क्रांतिकारियों को ऐसी सामूहिक फांसी दी गई थी।
अब नहीं रहा वह पीपल का पेड़
- समिति से जुड़े पदाधिकारियों और स्थानीय लोगों के मुताबिक वह पीपल का पेड़ तो अब नहीं रहा जहां बलिदानियों को फांसी दी गई थी। लेकिन स्मारक स्थल के पास अब एक वटवृक्ष जरूर है। समिति के मुताबिक गुमनाम बलिदानियों का विवरण जुटाने के तमाम प्रयास किए गए हैं। मगर वे भी अभी उपलब्ध नहीं हो सके हैं।
इसी स्मारक स्थल के सामने होती थी कोतवाली
- यह भी बताते हैं कि क्रांति के दौर में ही इसी स्मारक स्थल के सामने दायीं ओर नगर कोतवाली हुआ करती थी। अब यह कोतवाली यहां नहीं है। इसकी जगह अब यहां मिष्ठान और लोहे के कारोबार से जुड़ी दुकानें बन गई हैं।
सर उठाकर चलने वाले, सर झुका सम्मान से....
- इस शहीद स्मारक के शुरूआत में लिखी पंक्तियां ही यह एहसास कराती हैं कि इन क्रांतिकारियों के बलिदान का हर कोई सम्मान करें। यहां से गुजरने वाला शख्स नमन करे। ये पंक्तियां इस तरह हैं- उनका यह स्मारक है, जो खेले हैं अमने प्राण से, सर उठाकर चलने वाले सर झुका सम्मान से।
पंडित वासुदेव निर्मोही।- फोटो : SAHARANPUR
पंडति जयनाथ शर्मा- फोटो : SAHARANPUR
लोहा बाजार स्थित शहीद स्मार्क- फोटो : SAHARANPUR
लोहा बाजार स्थित शहीद स्मार्क- फोटो : SAHARANPUR