समय के साथ धुंधली हो गई सहारनपुर घराने की पहचान
सहारनपुर। संगीत के क्षेत्र में सहारनपुर ने देश को कई बड़े कलाकार और उस्ताद दिए हैं। इनमें सुरों के सरताज मोहम्मद रफी के उस्ताद अब्दुल वहीद खां और बॉलीवुड की संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद जैसे लोग खास हैं। आज यहां के तमाम कलाकार ग्वालियर घराना, आगरा घराना, बनारस घराना, किराना घराना और जयपुर घिराना से वाकिफ हैं, लेकिन सहारनपुर घराना और उसकी नींव रखने वाले सूफी संत मोहम्मद जमा से कोई वाकिफ नहीं है।
संगीत से जुड़ी और 1947 में प्रकाशित पुस्तक अध्याय युग-2 में सहारनपुर घराने का जिक्र है। सहारनपुर घराने में निर्मल शाह के शिष्य एवं सूफी संत मोहम्मद जमा बीन, रबाब और सितार बजाने के अलावा गायन में भी अद्वितीय थे और मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के दरबार में थे। गुलाम तकी, गुलाम जाफर और उनके पुत्र बंदेअली, बहराम खां और उनके शिष्यों में गौरी बाई, फरीद खां, पंजाबी, मौलाबख्श साखड़े वाले, मियां कालू (पटियाला) के शिष्यों और परिवार ने विरासत को आगे बढ़ाया। ध्रुपद गायक डागर बंधुओं में अमीनुद्दीन खां और मुइनुद्दीन खां के पिता नसीमुद्दीन भी इसी परिवार से थे। बचपन से संगीत से जुड़े सुशील नाज (62) बताते हैं कि उन्होंने सहारनपुर घराने के बारे में कभी नहीं सुना है, लेकिन बहराम खां के बारे में वह अच्छे से जानते हैं। मशहूर कव्वाल उस्ताद इकबाल और अफजल साबरी की जोड़ी के काफी करीब रहे राव महबूब भी सहारनपुर घराने से अनजान है।
संगीत की दुनिया में रहा है सहारनपुर घराने का भी बेमिसाल योगदान
-तबला वादक और मोहम्मद रफी के उस्ताद अब्दुल वहीद खां के पौत्र इकबाल अहमद का कहना है कि सहारनपुर घराने की विरासत को अकबर खां ने आगे बढ़ाया, डागर बंधु भी इसी परिवार के थे। डागर परिवार मूल रूप से अंबेहटा पीर में रहता था, जिसके बाद वह सहारनपुर में ढोलीखाल में बस गए थे। करीब सवा सौ वर्ष पहले कुछ लोग राजस्थान और कुछ दिल्ली चले गए थे।
-प्रयागराज में जन्मे और ग्वालियर घराने से रहे 77 वर्षीय पंडित रोशनलाल वर्मा का कहना है कि उन्होंने सहारनपुर घराने के बारे में सुना है, लेकिन करीब 1850 में इस घराने के कलाकार जयपुर चले गए थे। पंडित रोशन बताते हैं कि इस घराने के संस्थापक बहराम खां थे, जो हिन्दुस्तान में काफी प्रसिद्ध हुए हैं।
पंडित रोशन लाल वर्मा- फोटो : SAHARANPUR
इकबाल अहमद- फोटो : SAHARANPUR
सुशील नाज- फोटो : SAHARANPUR