सरसावा कस्बे में है ऐतिहासिक टीला, 2000 साल से पुराना बताया जाता है
पुरातत्व विभाग का सर्किल दफ्तर मेरठ में बनने से जगी उम्मीद
अमर उजाला ब्यूरो
सहारनपुर। ऐतिहासिक दृष्टि से सरसावा का सिंधुकालीन टीला सहारनपुर ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण साइट है। मेरठ में पुरातत्व विभाग का सर्किल कार्यालय बनने से उम्मीद जगी है कि यहां उत्खनन होगा। यदि उत्खनन होता है तो बहुत से राज बाहर निकलेंगे, जो काफी समय से चर्चाओं में रहे हैं।
यह टीला सरसावा कस्बे में ही है। उसके आसपास आबादी क्षेत्र है। इस टीले को लेकर कई कहानियां बताई जाती हैं। जैसे इसे महाराजा सिरसपाल का किला भी माना जाता है तो अन्य भी कई दावे होते हैं। टीले में दबे मिट्टी के बर्तनों के अवशेष भी यहां मिलते हैं तो कुछ ऐसी चीजें भी मिलती हैं, जो इस टीले को उत्तर वैदिक काल का होना दर्शाती हैं।
ऐतिहासिक स्थलों को बचाने की दिशा में काम कर रहे सरसावा के गांव सौराना निवासी शोधार्थी एवं लेखक राजीव उपाध्याय यायावर ने बताया कि करीब दो दशक पहले वाराणसी आर्कोलॉजिकल यूनिट के रीजनल अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव की देखरेख में टीले की फेंसिंग कराकर गेट लगाया गया था। इसके अलावा राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ की टीम ने भी यहां निरीक्षण किया था।
टीले के बारे में खास बातें
- सरसावा के टीले को कोट के नाम से जाना जाता है। कोट संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ किला होता है। इससे स्पष्ट होता है कि जहां सरसावा का टीला है, वहां कभी किला हुआ करता था।
- टीले से धूसर चित्रित मृदभांड के टुकड़े मिलते रहे हैं। इनका प्रयोग करीब 3500 वर्ष पहले किया जाता था। इसके अलावा टीले से कई संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त होते रहे हैं।
- टीले के ऊपरी हिस्से पर विशाल दीवारों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। टीले की विशालता क्रिकेट के मैदान जितनी है।
- टीले से प्राप्त अवशेषों के अध्ययन में यह भी पता चला कि 3500 वर्ष पुराने मृदभांड के बर्तन सिंधुकाल से संदर्भित हैं। यह साइट सिंधुकाल की सभ्यता के समकालीन है।
- पुरातत्वविदों का मानना है कि जब भी सरसावा के टीले का उत्खनन होगा तो उसमें से अनेक महत्वपूर्ण तत्य सामने आएंगे।
- टीले की मिट्टी में मिट्टी का मनका, टेरेकोटा बॉल, मिट्टी के खिलौने, पेेंटेड ग्रेवियर (पीजीडब्ल्यू) पोट्री जो उत्तर वैदिक काल की बताई जाती है।