देवबंद विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने साइकिल की रफ्तार को रोक दिया। चुनाव से पहले राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा हावी रही कि उपचुनाव का परिणाम सपा के खाते में ही जाएगा।
हालांकि कांग्रेस ने काफी सूझबूझ से यूपी में अपना गढ़ मजबूत करने के मकसद से चुनाव को काफी गंभीरता से लिया। यही वजह है कि एकतरफ सूबे में सत्ता का सहारा और राजेंद्र सिंह राणा निधन के बाद उपजी सहानुभूति का लहर भी सपा के काम नहीं आया।
देवबंद विधानसभा उपचुनाव का परिणाम मंगलवार को जब आया तो आम आदमी से लेकर राजनीति दलों के लोग चौंक गए। इस उपचुनाव को मंच बनाकर देवबंद के मतदाताओं ने यह आइना दिखाने की कोशिश की है कि वे अपने मताधिकार का बिना किसी दबाव प्रयोग करना भी जानते हैं।
सत्तासीन सपा से यह सीट छीनकर कांग्रेस की झोली में डालकर यहां के मतदाताओं ने साफ कर दिया कि वोटर नाराज होता है तो प्रमुख दल और बड़े उम्मीदवार उसके आगे टिक नहीं पाते हैं।
इस चुनाव के माध्यम से मुस्लिम मतदाताओं ने यह भी संदेश देने की कोशिश की है कि सिर्फ किसी पार्टी के साथ होने के ठप्पे या सत्ताधारी दल के डर में ही वे वोटिंग नहीं करते हैं, बल्कि मौका मिलते ही वह पाला बदलकर अपने वजूद का एहसास कराना भी जानते हैं।
वोटरों का रुझान भांपने में गच्चा खा गए ः देवबंद विधानसभा में लंबे समय तक सक्रिय राजनीति करने वाले राजेंद्र सिंह राणा के गढ़ में भी उनके परिवार के लोगों से लेकर सपा के अन्य रणनीतिकार भी वोटरों का रुझान भांपने में गच्चा खा गए लेकिन अब वोटरों ने ऐसा परिणाम सामने ला दिया है कि मंत्री के परिवार के लिए भी सियासी विरासत को बचाना भी अब आसान काम नहीं होगा।
शहर में गूंजा देवबंद का परिणाम ः यह उपचुनाव देवबंद विधानसभा के लिए जरूर था, लेकिन इसका चुनाव परिणाम पूरे शहर में गूंजता रहा। दोपहर बाद शहर के लगभग हर आदमी तक यह जानकारी पहुंच गई थी कि देवबंद में कौन जीता है और कौन हारा है। शहर का एक बड़ा तबका जहां इस अप्रत्याशित जीत से बेचैन नजर आया तो वहीं दूसरा तबका काफी खुश भी था।