इस्लामिक तालीम के सबसे बड़े मरकज दारुल उलूम की मौजूदगी के चलते देवबंद की सियासत पर हमेशा ही पूरे देश की निगाह रहती है। प्रदेश में अपनी जमीन तलाश रही कांग्रेस को मिली जीत मिशन-2017 की संजीवनी भी हो सकती है।
इस जीत के जरिए पूर्व विधायक इमरान मसूद ने कांग्रेस को अपनी ताकत दिखाई। इतना ही नहीं, चाचा को मात देकर सपा को भी अपने इरादे जता दिए हैं।
हालांकि वर्ष 2012 में भी कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित प्रदर्शन किया था। उस वक्त काजी रशीद मसूद और इमरान मसूद साथ थे। हालांकि चाचा भतीजे में अलगाव के बाद लगातार इनमें मुस्लिम मतों के लिए वर्चस्व की जंग जारी है।
कांग्रेस की सियासत में देवबंद की अहमियत हमेशा ही अहम रही है। वर्ष 1980 से पहले तक कांग्रेस ने देशभर के मुसलमानों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सदर मरहूम अशद मदनी को राज्यसभा भेजती रही थी।
हालांकि राष्ट्रीय लोकदल ने भी कांग्रेस की राह पर चल कर उनके बेटे महमूद मदनी को भी राज्यसभा भेजा था। अब मुस्लिम मतों को रिझाने की होड़ के बीच देवबंद सीट पर कांग्रेस अपनी इस जीत को प्रदेशभर में भुनाने की कोशिश करेगी।
बता दें कि सहारनपुर की सियासत में पूर्व सांसद रशीद मसूद का दखल हमेशा रहा है। वर्ष 2011 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सपा छोड़कर कांग्रेस में पहुंचे रशीद मसूद को कांग्रेस ने हाथों हाथ लिया और राज्यसभा भेजने के साथ ही एपिडा का चेयरमैन भी बनाया। विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने जबर्दस्त प्रदर्शन किया था।
गंगोह में जीत के साथ बाकी छह सीटों उसका प्रदर्शन बेहतरीन रहा था। हालांकि विरासत की जंग में इमरान मसूद और रशीद मसूद में तल्खी आई। इमरान ने चाचा का साथ छोड़कर सपा का दामन थामा और पार्टी के लोकसभा प्रत्याशी बने।
इस बीच एमबीबीएस सीट घोटाले में सजा होने के बाद रशीद मसूद कांग्रेस में हासिये पर चले गए। सियासत में उलटफेर करते हुए रशीद ने इमरान की जगह अपने बेटे को सपा का प्रत्याशी बनाया तो इमरान कांग्रेस के उम्मीदवार बन गए।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में इमरान मसूद ने चार लाख से ज्यादा मत लिए थे। मगर, देवबंद जीत के साथ अब इमरान मसूद कांग्रेस आलाकमान को यह बताने में कसर नहीं छोड़ेंगे कि वर्ष 2012 में कांग्रेस के प्रदर्शन के पीछे भी उन्हीं की भूमिका रही थी।
वर्तमान हालात में देवबंद में मिली कांग्रेस की इस जीत को बड़ी सफलता के रुप में देखा जा रहा है। ऐसे में सियासी गलियारे में चर्चा है कि कांग्रेस भी इमरान मसूद को अहमियत दे सकती है। कारण, करीब एक साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव काग्रेस हर हाल में मुस्लिम मतों को रिझाना चाहेगी।