सहारनपुर। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ने और हंसते हंसते अपने प्राण न्यौछावर करने वाले शहीद ए आजम भगत सिंह का सहारनपुर से गहरा नाता था। अंग्रेज अफसर की हत्या का आरोप लगने पर जब वह फरार चल रहे थे तो कई बार सहारनपुर आए थे। यहां वह क्रांतिकारियों के लिए किसी ऊर्जा से कम नहीं थे।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उसके बाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चली लड़ाई में सहारनपुर अग्रणी रहा है। उसके प्रमाण आज भी यहां मौजूद हैं। इनमें से एक है पांवधोई नदी के किनारे स्थित फुलवारी आश्रम। इसी आश्रम में शहीद ए आजम भगत सिंह भी आकर रुके थे। बताया जाता है कि फरारी के दौरान क्रांतिकारियों द्वारा उन्हें इसी फुलवारी आश्रम के मंदिर की गुफा में छिपाया जाता था। बताया जाता है कि फरारी के दौरान सरदार भगत सिंह यूपी के कई जिलों में आए थे, उनमें सहारनपुर के अलावा कानपुर और अलीगढ़ भी शामिल है।
भगत सिंह द्वारा लिखे तीन पत्र हैं मौजूद
सहारनपुर। शहर के प्रद्युमननगर में सरदार भगत सिंह के भतीजे सरदार किरणजीत सिंह का परिवार रहता है। सरदार भगत सिंह की मां पंजाब माता विद्यावती भी यहां कई दशक तक रहीं हैं। मकान पर शहीद भगत सिंह निवास बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है। किरणजीत सिंह बताते हैं कि सरदार भगत सिंह के वस्त्र, जन्मपत्री, गीता, केस से जुड़ी फाइल आदि महत्वपूर्ण दस्तावेज तो एक साल पहले ही पैतृक गांव में बनाए गए संग्रहालय में रखवा दिए गए हैं। फिलहाल तीन पत्र उनके पास हैं, जो खुद शहीद भगत सिंह ने लिखे थे। इनमें दो पत्र दादा अर्जुन सिंह को लिखे, जो उर्दू में हैं, जबकि एक पत्र अंग्रेजी में लिखा है जो सेंट्रल जेल लाहौर से अपने मित्र जयदेव गुप्ता निवासी लाहौर को भेजा था।
पढ़ते थे क्रांति और साहित्यिक किताबें
सहारनपुर। किरणजीत सिंह ने बताया कि सरदार भगत सिंह हर सप्ताह अलग अलग पुस्तकें द्वारकादास लाइब्रेरी लाहौर से मंगवाते थे। जेल से भेजा जो पत्र उनके पास है, उसमें भी रूस, आयरलैंड, फ्रांस की क्रांति और आर्थिक सुधार संबंधी किताबें मंगाने के बारे में लिखा है। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश सरकार के जासूसी विभाग के लोग सेंसर करके किताबें जेल में भगत सिंह तक पहुंचने देते थे।
1950 में सहारनपुर आया था परिवार
सहारनपुर। किरणजीत सिंह संधु के मुताबिक उनके दादा सरदार किशन सिंह के परिवार में सबसे बडे़ सरदार भगत सिंह, दूसरे नंबर पर कुलबीर सिंह, तीसरे नंबर पर कुलतार सिंह, चौथे नंबर पर रणबीर सिंह व पांचवे नंबर पर राजेंद्र सिंह हुए। लाहौर से कुलबीर सिंह और कुलतार सिंह 1950 में सहारनपुर आ गए थे, जबकि रणबीर सिंह और राजेंद्र सिंह बाजपुर में चले गए थे। कुलबीर सिंह भी 1960 में फिरोजपुर चले गए थे।
चौक फिरोजशाह में बनाए जाते थे बम
सहारनपुर। अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ चल रहे आंदोलन में सहारनपुर शहर के लोग इस कदर जुड़े थे कि शहर के मोहल्ला चौक फिरोजशाह में बम फैक्टरी तक लगा दी थी। तब डाक्टर गया प्रसाद कटियार, जयदेव कपूर और शिव वर्मा को गिरफ्तार किया गया था।
फुलवारी आश्रम की अहम भूमिका
फुलवारी आश्रम आजादी के मतवालों की शरणगाह व नमक आंदोलन का गवाह बना था। ललता प्रसाद अख्तर ने 1919 में गोरक्षा व सामाजिक सुधार की शपथ लेकर हिन्दू कुमार सभा की स्थापना की थी। फुलवारी आश्रम में साथियों के साथ रक्षाबंधन पर मेला शुरू कर दिया। जब महात्मा गांधी ने नमक कानून तोड़ा तो इसकी आग सहारनपुर तक आ पहुंची थी। फुलवारी आश्रम से इसकी शुरुआत कर दी गई थी। नमक कानून तोड़ने का आंदोलन विधिवत शुरू हो चुका था। शहर के हर नौजवान के भीतर खून खौल रहा था। गुरुकुल कांगड़ी से आया जत्था भी फुलवारी आश्रम पहुंचा और नमक कानून तोड़ने व विदेशी कपड़ा छोड़ने की शपथ ली। तब नारा गूंजता था कि नमक कानून तोड़ दिया, ब्रिटिश का माथा फोड़ दिया।
सहारनपुर में बाबा लाल दास रोड स्थित फुलवारी आश्रम की बुरजी में का द्वार- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर में बाबा लाल दास रोड स्थित फुलवारी आश्रम इतिहास लिखा शिलापट- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर में बाबा लाल दास रोड स्थित फुलवारी आश्रम में बना दंगल स्थल- फोटो : SAHARANPUR
सरदार भगत सिंह के भतीजे सरदार किरणजीत सिंह- फोटो : SAHARANPUR
सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की अस्थियां इसी पात्र में लाई गई थीं।- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर के प्रद्युमननगर में सरदार भगत सिंह के भतीजे का मकान- फोटो : SAHARANPUR
सरदार भगत सिंह की मां विद्यावती (फाइल फोटो)- फोटो : SAHARANPUR