सहारनपुर। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक किसानों को धान की डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) विधि को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसमें खेत में धान की पौध के बजाए गेहूं की तर्ज पर सीधे बीज की बुआई होती है। इसमें न सिर्फ धान की रोपाई का खर्च बचता है बल्कि पानी की भी कम आवश्यकता पड़ती है।
इस तकनीक से धान की खेती करने के लिए पहले खेत को लेजर लैंड लेवलर के माध्यम से समतल किया जाता है। इसके बाद खेत का पलेवा किया जाता है। खेत के जुताई योग्य होने पर सीड ड्रिल के माध्यम से धान के बीज की बुआई कर हल्का पटेला लगाया जाता है। इस विधि में एक एकड़ खेत में आठ से दस किलो बीज लगता है। खरपतवार पर नियंत्रण के लिए बुआई के तुरंत बाद किसी खरपतवार नाशी का छिड़काव करना चाहिए। इसमें पहला पानी करीब 21 दिनों के बाद दिया जाता है।
बुआई से पहले करें बीज शोधन
किसानों को बुआई से पहले धान की बीज का शोधन करना चाहिए। इससे धान में लगने वाले बीज जनित रोगों पर नियंत्रण हो जाता है। इसके लिए तीन ग्राम कार्बेंडाजिम प्लस मैंकोजेब का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाना चाहिए। इस घोल में स्वस्थ बीज को आठ घंटे तक भिगोने के बाद छाया में सुखाकर बुआई करनी चाहिए।
इस विधि के लाभ
- पानी की कम आवश्यकता
- नर्सरी की आवश्यकता नहीं
- रोपाई में लगने वाले खर्च की बचत
- धान की लागत में कमी
- मृदा की निचली सतह कठोर होने से बचती है
जनपद के किसानों को धान की डीएसआर विधि को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस विधि से जहां लागत में कमी आती है, वहीं पानी की भी बचत होती है। किसानों को धान की इस विधि को भी प्रयोगात्मक तौर पर अपनाना चाहिए। - डॉक्टर आईके कुशवाहा, प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र।