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अंधविश्वास या श्राप: दो गांवों के लिए बना अभिशाप, आज भी आपस में न रिश्ते तय करते न पीते पड़ोसी गांव का पानी

Sun, 17 Sep 2023 05:31 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर

सार

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में आज भी दो गांव ऐसे हैं जहां लोग एक दूसरे गांव का पानी तक नहीं पीते। एक दूसरे गांव के दुकानदार से सामान तक नहीं लेते। यही नहीं एक दूसरे गांव में बच्चों की शादियां भी नहीं की जाती। आखिर क्या है इसके पीछे की वजह जानिए आगे। 
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कातला गांव के लोग नहीं पीते सिसौना गांव का पानी - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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भले ही हम आधुनिक दौर में जी रहे हों, लेकिन उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में आज भी दो गांवों में बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई परंपरा को बखूबी निभाया जा रहा है।

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बड़गांव क्षेत्र में गांव कातला के लोग सिसौनी का खाना खाना तो दूर की बात गांव की सीमा का पानी तक नहीं पीते हैं। इसी परंपरा के चलते दोनों गांवों के लोगों में आपस में रिश्ते तक नहीं होते हैं। पति की हत्या के बाद सती हुई महिला के श्राप के कारण इन गांवों के बाशिंदे सैकड़ों सालों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। 

बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा अंग्रेजों के शासनकाल के समय से चली आ रही है। उस वक्त सिसौनी गांव की एक लड़की की शादी कातला गांव में हुई थी। कातला गांव निवासी दामाद सिसौनी गांव के जंगल में हर रोज गाय, बकरी, भेड़ चराने के लिए जाया करता था। यह बात सिसौनी निवासी ससुरालियों को अच्छी नहीं लगती थी।

ससुराल के लोगों ने युवक को मना किया, लेकिन वह नहीं माना। इस पर उन्होंने एक दिन कातला निवासी अपने दामाद की पीट-पीट कर हत्या कर दी, जब यह बात मायके में मौजूद उनकी बेटी को पता चली तो वह अकेली जंगल में पहुंची और रोते बिलखते अपने पति के शव को लेकर कातला के लिए चली। रास्ते में खुदाबक्सपुर माजरा व बड़गांव के बीच वह अपने पति के साथ सती हो गई।

बताया जाता है कि सती होने से पहले उसने श्राप दिया कि यदि कातला के लोगों ने सिसौनी गांव में खाना तो दूर पानी तक भी पिया तो विक्षिप्त हो जाएंगे। वहीं सिसौनी गांव के लोगों को परिवार में एक बच्चा पैदा होने का श्राप दिया था। सिसौनी गांव में तो कई पीढ़ियों तक परिवारों में एक ही संतान हुई।

हालांकि बाद में यह रीत टूट गई, लेकिन कातला गांव के लोग परंपरा को निभा रहे हैं। दोनों गांवों के लोगों में आपसी प्यार भी बहुत है, लेकिन वे आपस में रिश्ते भी नहीं करते हैं। खुदाबक्सपुर माजरा और बड़गांव के बीच जहां महिला सती हुई थी। वहां आज भी क्षेत्र के 12 गांवों में शादी होने के बाद नवविवाहिता जोड़ा सती माता का आशीर्वाद लेने पहुंचता है।

कातला के पूर्व प्रधान ठा. सुखपाल सिंह का कहना है कि पुरखों के वक्त से यह विश्वास चला आ रहा है कि किसी ने इस परंपरा को तोड़ा तो दिक्कत होगी। उन्होंने भी अपने जीवन में कभी सिसौनी का पानी नहीं पिया।

सिसौनी के पूर्व प्रधान सतपाल सिंह ने बताया कि भले ही इसे अंधविश्वास माना जाए, लेकिन यह परंपरा एक सच्ची घटना के बाद पड़ी है। भले ही आक्रोश की प्रतिक्रियास्वरूप इस परंपरा का जन्म हुआ हो।
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सिसौनी के दुकानदार से सामान तक नहीं लेते 
बड़गांव में लगने वाले पैठ बाजार में सिसौनी के दुकानदार तक से सब्जी या अन्य सामान कातला के लोग नहीं लेते हैं। यदि गलती से सामान खरीद लें और बाद में पता चले कि यह सिसौनी गांव का दुकानदार था तो उसे सामान वापस कर अपने पैसे ले जाते हैं।
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