इसे जेएस संत सिंह एंड संस ने लुहारी दरवाजा लाहौर से प्रकाशित किया था, जबकि महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित आदि काव्य रामायण का 272 पेज में उर्दू अनुवाद सन 1949 में कीर्तन कलानिधि बानी भूषण नाटिया आचार्य महा कवि श्री शिव नारायण तसकीन ने किया था। मौलाना शफीक ने बताया रामायण वाल्मिकी के उर्दू अनुवाद का प्रकाशन गेलाराम एंड संस द्वारा दिल्ली से किया गया गया था। यह इसका द्वितीय संस्करण है।
धर्म ग्रंथों को केमिकल लगाकर किया गया है संग्रहीत
दारुल उलूम के पुस्तकालय के शोकेस में तुलसीदास रामायण और वाल्मिकी रामायण को बहुत ही संभाल कर रखा गया है। अधिक पुरानी होने के कारण दोनों रामायण के पन्ने बेहद कमजोर पड़ चुके हैं और इनका रंग तक बदल चुका है। खराब न हो इसलिए इन्हें केमिकल लगाकर संग्रहीत किया गया है।
दारुल उलूम की लाइब्रेरी में ऐतिहासिक पुस्तकों को देखते अपर जिला जज सुरेश चंद भारती
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ऐतिहासिक जखीरा, सुरक्षा भी ऐसी
दोनों रामायण की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की इन्हें शोकेस से बाहर निकालकर देखने के लिए संस्था के किसी बड़े जिम्मेदार की लिखित अनुमति लेना जरूरी है। उसके बिना इन धर्म ग्रन्थों को केवल दूर से ही निहारा जा सकता है।