सहारनपुर में गन्ने और अन्य रबी की फसलों के बजाए औषधीय खेती किसानों के लिए मुफीद साबित हो रही है। औषधीय खेती से किसानों के दिन बहुर गए है।
जिले के दर्जन भर गांवों के किसान ओरिगेनो, मारजोरम, थाइम, सेज, पारसले, बेसिल, लीक आदि औषधीय फसल की पैदावार कर रहे हैं। किसानों ने बताया कि यह फसल देहरादून स्थित एक कंपनी को सप्लाई की जा रही है, जहां से इसका कई देशों को निर्यात किया जा रहा है।
औसतन छह महीने की इन फसलों से किसानों को प्रति बीघा 18 से 20 हजार रुपये की बचत हो जाती है। यह आय गेहूं सहित अन्य रबी फसलों के मुकाबले चार गुना अधिक है।
परंपरागत खेती में बढ़ती लागत और घटती आमदनी ने किसानों का रुख कृषि विविधिकरण की ओर कर दिया है। जिले के करीब दर्जन भर गांवों के कई किसानों के लिए औषधीय फसलों की खेती वरदान साबित हो रही है।
प्रगतिशील किसानों के अनुसार फसलों की सप्लाई के लिए उन्होंने देहरादून स्थित एक कंपनी के साथ अनुबंध किया हुआ है। कंपनी के सुपरवाइजर खेत से औषधीय फसल को अपने वाहनों में लोड कराकर देहरादून ले जाते हैं।
वहीं से किसानों को भुगतान किया जाता है। कांट्रेक्ट फार्मिग के माध्यम से इन गांवों में हो रही औषधीय खेती में कंपनी अपनी आवश्यकता के मुताबिक फसलों का उत्पादन कराती है। इसके लिए कंपनी बीज, पौध और कीटनाशकों का प्रबंध कराती है और अपनी देखरेख में खेती कराती है।
इसके अलावा समय-समय पर कंपनी के विशेषज्ञ आकर फसलों का निरीक्षण भी करते हैं। फसलों पर मुख्यालय से सैटेलाइट के जरिए निगरानी की जाती है।
गांव बालपुर के औषधीय खेती कर रहे प्रगतिशील और उद्यान रत्न से सम्मानित किसान मदनलाल सैनी और श्यामलाल सैनी बताते हैं कि इन औषधीय
फसलों की बुवाई सितंबर से अक्टूबर महीने तक होती है। इनमें से अधिकतर फसलों की कटाई दो से तीन बार तक की जाती हैं। इसके बाद किसान उन खेतों में दूसरी फसलें पैदा करते हैं।
शर्त ये है कि उन खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग ना हो। जिले में बालपुर, हलालपुर, शाहपुर, सकलापुरी, कालोगढ, माटकी झरौली, सुन्दरपुर आदि गांवों इनकी खेती हो रही है।